वेद में विष्णु को संसार का रक्षक होने के कारण गोप कहा गया है. संस्कृत में गो का अर्थ तारे, आकाश, पृथ्वी, प्रकाश की किरण, स्वर्ग, मवेशी, वाणी, सूर्य, चन्द्रमा, गाय आदि होता है. इन सबका पालनकर्ता होने से परमेश्वर गोप, गोपाल, गोपेन्द्र आदि कहाता है. ईश्वर की माया या प्रकृति गोपी या गोपिका कहलाती है. जैसे माया से ईश्वर मायापति कहलाता है वैसे ही माया के पर्यायवाची शब्द गोपी से वह गोपीनाथ कहलाता है. रास शब्द का संस्कृत भाषा में अर्थ होता है ध्वनि तथा लीला का अर्थ क्रीडा करना होता है. अपनी माया या गोपी के साथ परमेश्वर आज भी ध्वनिमय क्रीडा कर रहा है. गो का अर्थ गाय भी होने से गोप ग्वाले को भी तथा गोपी उसकी पत्नी अर्थात् ग्वालिन को भी कहते हैं. देवकीनन्दन कृष्ण को विष्णु का अवतार मान लेने के बाद मायापति की लीला को गलत अर्थ में ले लिया गया. विष्णु की रास लीला कृष्ण की काम क्रीड़ा बन गयी. मूलत: कृष्ण नाम विष्णु का पर्यायवाची है. इस प्रकार कृष्ण नाम की महिमा को पुराण न्यून करते हैं. Labels: ईश्वर, कृष्ण, परमेश्वर, प्रकृति, माया, लीला, विष्णु, वेद, संसार





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