‘स:’ शब्द के कहे जाने से ब्रह्म व्यक्ति विशेष हो जाता, इससे जीव-जगत के साथ उसका सम्पूर्ण अलगाव सूचित होता. इसलिए स: के स्थान पर निर्गुण वाचक ‘तत्’ शब्द का प्रयोग वेदों में किया गया है और तत् शब्द से निर्गुण ब्रह्म का प्रचार हुआ है.
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