जब ब्रह्म नाना जीव-विषयों से युक्त जगत् के रूप में अपने को प्रकट करता है तो यह ईश्वर की माया सामूहिक अर्थ में होने के कारण समष्टि माया कहलाती है. जब कोई प्राणी अज्ञानता के कारण जगत् को एक ब्रह्ममय देखने के बजाय अनेक जीवों और विषयों के रूप में देखता है तो वह व्यष्टि माया से ग्रस्त या अविद्या से ग्रस्त होता है. व्यवहार में पहले अर्थ में माया तथा दूसरे अर्थ में अविद्या शब्द प्रयुक्त होता है. Labels: अज्ञानता, अविद्या, जगत्, जीव, प्राणी, ब्रह्म, माया, विषय, व्यष्टि, समष्टि





0 Comments:
Post a Comment
Links to this post:
Create a Link