स्वाहा शब्द संस्कृत के ‘सु’ उपसर्ग तथा ‘आह्वे’ धातु से बना है. ‘सु’ उपसर्ग ‘अच्छा या सुन्दर या ठीक प्रकार से’ का बोध कराने के लिए शब्द या धातु के साथ जोड़ा जाता है. ‘आह्वे’ का अर्थ बुलाना होता है. यज्ञ करते समय किसी देवता को उचित रीति से आदरपूर्वक बुलाने के लिए स्वाहा शब्द का प्रयोग किया जाता है. संस्कृत व्याकरण में नम:, स्वस्ति, स्वाहा के साथ चतुर्थी या सम्प्रदान कारक का प्रयोग होता है. इसीलिए कहा जाता है ‘अग्नये स्वाहा’ ‘नम: शिवाय’ आदि. यजुर्वेद में स्वाहा शब्द का बहुत प्रयोग हुआ है क्योंकि इसमें यज्ञ करने की रीति बतायी गयी है.





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