यजुर्वेद के बत्तीसवें अध्याय में परमात्मा के विषय में कहा गया है कि अग्नि वही है, आदित्य वही है, वायु, चन्द्र और शुक्र वही है, जल, प्रजापति और सर्वत्र भी वही है. वह प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता है. उसकी कोई प्रतिमा नहीं है (न तस्य प्रतिमा). उसका नाम ही अत्यन्त महान है. वह सब दिशाओं को व्याप्त कर स्थित है. स्पष्ट है कि वेद के अनुसार ईश्वर की न तो कोई प्रतिमा या मूर्ति है और न ही उसे प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है. किसी मूर्ति में ईश्वर के बसने या ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन करने का कथन वेदसम्मत नहीं है. Labels: अग्नि, ईश्वर, चन्द्र, जल, दर्शन, परमात्मा, प्रतिमा, मूर्ति पूजा, वायु, वेद





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