गायत्री मंत्र में सूर्य की उपासना की गयी है अथवा ईश्‍वर की इस मन्‍त्र का अर्थ क्‍या है ?

गायत्री मंत्र का प्रारम्‍भ ओम् से होता है. माण्‍डूक्‍योपनि‍षद् में ओंकार अर्थात् ओम् के महत्‍व तथा अर्थ दोनों पर प्रकाश डाला गया है. ओम् स्‍वयं में एक मंत्र है जि‍से प्रणव भी कहते हैं. यह अ, उ, म् इन तीन अक्षरों को मि‍ला कर बना है. अ से ब्रह्म का वि‍राट रूप, उ से हि‍रण्‍यगर्भ या तैजस रूप, म् से ईश्‍वर या प्राज्ञ रूप का बोध होता है. यह ब्रह्माण्‍ड ही ब्रह्म का शरीर या वि‍राट रूप है. अपनी लीला को पूर्ण रूप में व्‍यक्‍त करने के कारण वह वि‍राट या वि‍श्‍व या वैश्‍वानर कहलाता है. जो आप स्‍वयंप्रकाश और सूर्यादि‍ लोकों का प्रकाश करने वाला है, इससे परमेश्‍वर का नाम हि‍रण्‍यगर्भ या तैजस है. जि‍सका सत्‍य वि‍चारशील ज्ञान और अनन्‍त ऐश्‍वर्य है, उससे उस परमात्‍मा का नाम ईश्‍वर है और सब चराचर जगत् के व्‍यवहार को यथावत् जानने के कारण वह ईश्‍वर ही प्राज्ञ कहलाता है. गायत्री मंत्र का शेष भाग ‛भूर्भुव: स्‍व:. तत्‍सवि‍तुर्वरेण्‍यं भर्गो देवस्‍य धीमहि‍. धि‍यो यो न: प्रचोदयात्.’ यजुर्वेद के छत्‍तीसवें अध्‍याय से लि‍या गया है जि‍समें सवि‍ता के साथ सूर्य की अलग से वन्‍दना है. सवि‍ता का मूल शब्‍द सवि‍तृ है जि‍सका अर्थ सूर्य के साथ प्रेरक ईश्‍वर भी होता है. जैसे हरि‍ का अर्थ बन्‍दर और ईश्‍वर होता है और सन्‍दर्भानुसार ही हम उसका अर्थ ग्रहण करते हैं. उसी प्रकार चूँकि‍ यह मंत्र बुद्धि‍ को प्रेरि‍त करने की प्रार्थना करता है अत: सवि‍ता का अर्थ प्रेरि‍त करने की क्षमता वाले ईश्‍वर से ही करना चाहि‍ए.

गायत्री मंत्र में भू: शब्‍द पदार्थ और ऊर्जा के अर्थ में, भुव: शब्‍द अन्‍तरि‍क्ष के अर्थ में तथा स्‍व: शब्‍द आत्‍मा के अर्थ में प्रयुक्‍त हुआ है. शुद्ध स्‍वरूप और पवि‍त्र करने वाला चेतन ब्रह्म स्‍वरूप ईश्‍वर को ही भर्ग कहा जाता है. इस प्रकार गायत्री मंत्र का अर्थ हुआ ‒ पदार्थ और ऊर्जा (भू:), अन्‍तरि‍क्ष (भुव:) और आत्‍मा (स्‍व:) में वि‍चरण करने वाला सर्वशक्‍ति‍मान ईश्‍वर (ओम्) है. उस प्रेरक (सवि‍तु:) पूज्‍यतम (वरेण्‍यं) शुद्ध स्‍वरूप (भर्ग:) देव का (देवस्‍य) हमारा मन अथवा हमारी बुद्धि‍ धारण करे (धीमहि‍). वह जगदीश्‍वर (य:) हमारी (न:) बुद्धि‍ (धि‍य:) को अच्‍छे कामों में प्रवृत्‍त करे (प्रचोदयात्). इस प्रकार गायत्री मंत्र ब्रह्म के स्‍वरूप, ईश्‍वर की महि‍मा का वर्णन करते हुए प्रार्थना मंत्र का स्‍वरूप ले लेता है.

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त्रि‍देव वास्‍तव में एक देव ही है, इसका प्रमाण दीजि‍ए.

सृष्‍टि‍स्‍थि‍त्‍यन्‍त करणीं ब्रह्मवि‍ष्‍णुशि‍वात्‍मि‍काम्.
स संज्ञां याति‍ भगवानेक एव जनार्दन:

(वि‍ष्‍णु पुराण 1-2-66)

वह एक ही भगवान् जनार्दन जगत् की सृष्‍टि‍, स्‍थि‍ति‍ और संहार के लि‍ए ब्रह्मा, वि‍ष्‍णु और शि‍व ‒ इन तीन संज्ञाओं को धारण करते हैं.

एको देव: सर्वभूतेषु गूढ़:
सर्वव्‍यापी सर्वभूतान्‍तरात्‍मा
कर्माध्‍यक्ष: सर्वभूताधि‍वास:
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्‍च.

(श्‍वेताश्‍वतरोपनि‍षद्)

समस्‍त प्राणि‍यों में स्‍थि‍त एक देव है, वह सर्वव्‍यापक, समस्‍त भूतों का अन्‍तरात्‍मा, कर्मों का अधि‍ष्‍ठाता, समस्‍त प्राणि‍यों में बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनत्‍व प्रदान करने वाला, शुद्ध और निर्गुण है.

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मूर्ति‍ पूजा का समर्थन करना चाहि‍ए या विरोध ?

जैसे विन्‍दु की परि‍भाषा दी जाती है कि‍ जि‍समें लम्‍बाई-चौड़ाई न हो फि‍र भी आप कि‍तना भी छोटा वि‍न्‍दु बनायें कुछ न कुछ लम्‍बाई और चौड़ाई अवश्‍य होगी; जैसे रेखा की परि‍भाषा दी जाती है कि‍ जि‍समें केवल लम्‍बाई हो चौड़ाई न हो फि‍र भी कि‍तनी ही पतली रेखा खींची जाय चौड़ाई अवश्‍य होगी वैसे ही मन को नि‍राकार में केन्‍द्रि‍त नहीं कि‍या जा सकता; अत: हम परमात्‍मा के कि‍सी नाम को लि‍पि‍ के अनुसार अक्षरों में केन्‍द्रि‍त कर सकते हैं या कि‍सी प्रति‍मा में उसका आरोपण कर सकते हैं. वैदि‍क काल में जब न तो मन्‍दि‍र थे और न ही मूर्ति‍, अग्‍नि‍ प्रज्‍वलि‍त कर उसमें हवन सामग्री डालते हुए कि‍सी देव-नाम का आह्वान कि‍या जाता था. उपनि‍षदों के ज्ञाता यज्ञ की प्रक्रि‍या छोड़ कर ओम् अक्षर पर ही अपना ध्‍यान केन्‍द्रि‍त करने लगे. बुद्ध और महावीर की मूर्ति‍यों को अपार जन-समर्थन मि‍लने के कारण यहॉं भी वि‍भि‍न्‍न सम्‍प्रदायों ने मूर्ति‍ पूजा को आधार बनाया. मन्‍दि‍र, मस्‍जि‍द या चर्च का र्नि‍माण भी प्रति‍मा में वि‍श्‍वास ही है. वैदि‍क आर्य तो मन्‍दि‍र का भी र्नि‍माण नहीं करते थे. वास्‍तवि‍क अर्थ में वे ही मूर्ति‍पूजक नहीं थे. अत: अन्‍य धर्मों के प्रचारक यह कहने की स्‍थि‍ति‍ में नहीं हैं कि‍ वे मूर्ति‍पूजक नहीं है. सूफी सन्‍तों की मजार बनाना या ईसा को क्रूस पर लटके दि‍खाना, या मृतक की समाधि‍ बनाना सब कुछ कि‍सी प्रति‍मा का पूजन ही है. इस प्रकार जो काम सब कर रहे हैं उसको देखते हुए मन्‍दि‍र में कि‍सी मूर्ति‍ को स्‍थापि‍त कर देने का वि‍रोध नहीं कि‍या जा सकता.

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देवासुर संग्राम से क्‍या तात्‍पर्य है ?

परमात्‍मा ने सुख प्राप्‍ति‍ के लि‍ए इन्‍द्रि‍याँ बनायी हैं. इन्‍द्रि‍यों के माध्‍यम से मन ही सुख भोगता है. स्‍मरण-शक्‍ति‍ के कारण मन पूर्व में भोगे गये सुख को याद रखता है. इस सुख को पाने के लि‍ए मन अनुचि‍त साधन भी अपना लेता है. परमात्‍मा ने मन को देवत्‍व प्रदान कि‍या है. कि‍न्‍तु इन्‍द्रि‍य सुख की प्रबल कामना मन को असुर बना देती है. असुर का अर्थ है बुराई को गति‍ देने वाला. अच्‍छे संस्‍कार मन को अच्‍छाई या देवत्‍व के गुण अपनाने को प्रेरि‍त करते हैं. इन्‍द्रि‍य सुख का लोभ मन को बुराई की ओर ढकेल देता है और वह बलात्‍कार, छल, कपट आदि‍ में संलग्‍न हो जाता है. दो वि‍परीत धाराओं में मन का जाना ही देवासुर संग्राम है. मन ही देवता है, मन ही राक्षस है. मानसि‍क द्वन्‍द्व के अति‍रि‍क्‍त देवासुर संग्राम कभी अस्‍ति‍त्‍व में नहीं रहा.

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समानता का सि‍द्धान्‍त क्‍या पश्‍चि‍मी वि‍चार है ?

अथर्ववेद के तृतीय काण्‍ड के सूक्‍त संख्‍या तीस में समानता के सि‍द्धान्‍त का पहले से वर्णन है. यह सूक्‍त कहता है कि‍ हे वि‍वादी पुरुणों! गौऍं जैसे अपने वत्‍स से स्‍नेह करती हैं, वैसे ही तुम परस्‍पर व्‍यवहार करो. पुत्र पि‍ता का अनुगत हो, माता भी पुत्र के अनुकूल मन वाली हो, पत्‍नी पति‍ से मधुर वाणी बोलने वाली हो. भाग बांटने के लि‍ए भ्राता भ्राता का बुरा न करे. बहि‍न-भाई से बैर न करें. यह सब भाई समान कार्य और समान गति‍ वाले होकर मंगलमय बातें करें. तुम समान मन वाले, समान कार्य वाले रहकर छोटे-बड़े का ध्‍यान रखते हुए परस्‍पर सुन्‍दर वचन कहो. हे मनुष्‍यो! मैं तुम्‍हें समान कार्यों में प्रवृत्त करता हूँ. समानता के इच्‍छुको ! तुम्‍हारा अन्‍न-पानी का उपभोग एक सा हो. मैं तुम्‍हें प्रेम-सूत्र में साथ-साथ बांधता हूँ. इस प्रकार समानता का सि‍द्धान्‍त मूलत: पश्‍चि‍मी वि‍चार नहीं है.

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ब्रह्म को प्रणाम करने वाला कोई वेद मन्‍त्र बतायें.

यो भूतं च भव्‍य च सर्व यश्‍चाधि‍ति‍ष्‍ठति‍
स्‍वर्यस्‍य च केवलं तस्‍मै ज्‍येष्‍ठाय ब्रह्मणे नम:.
(अथर्ववेद 10-8-1)
जो भूत, भवि‍ष्‍य और सबमें व्‍यापक है, जो दि‍व्‍यलोक का भी अधि‍ष्‍ठाता है, उस ब्रह्म को प्रणाम है.

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पौराणि‍क कथाओं से क्‍या तात्‍पर्य है ?

पौराणि‍क कथाएँ वे कथाएँ हैं जि‍नमें सृष्‍टि‍ की उत्‍पत्‍ति‍, प्राकृति‍क और दैवीय घटनाओं, मानव समाज और जीवन, जादू-टोना आदि‍ के बारे में प्राचीन मानव ने कल्‍पना की थी.

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सामाजि‍क स्‍तरीकरण क्‍या है? वर्ण स्‍तरीकरण तथा वर्ग स्‍तरीकरण कैसे उत्‍पन्‍न हुए ?

समाज के वि‍भि‍न्‍न स्‍तरों में वि‍भाजन को सामाजि‍क स्‍तरीकरण कहते हैं. वर्ण स्‍तरीकरण झूठ के प्रचार से केवल भारत में उत्‍पन्‍न हुआ है. वर्ग स्‍तरीकरण वि‍श्‍व व्‍यापी है और उसके उत्‍पन्‍न होने के अनेक कारण हैं जैसे पूंजीपति‍ और श्रमि‍क वर्ग औद्योगीकरण की देन हैं, धन की वि‍भि‍न्‍न अवस्‍था धनी, मध्‍यम और र्नि‍धन वर्ग को जन्‍म देती है.

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कौन देखता है ?

मातृवत्‍परदारांश्‍च परद्रव्‍याणि‍ लोष्‍ठवत्
आत्‍मवत्सर्वभूतानि‍ य: पश्‍यति‍ स पश्‍यति‍

परायी स्‍त्री को जो माता के समान, पराये धन को मि‍ट्टी के ढेले के समान तथा सब प्राणि‍यों को अपने समान देखता है, वास्‍तव में वही देखता है.

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कर्म का सि‍द्धान्‍त वि‍ज्ञान सम्‍मत कैसे हो सकता है ?

कर्म और क्रि‍या में कोई भेद नहीं है. प्रत्‍येक क्रि‍या की प्रति‍क्रि‍या होती है, यह वि‍ज्ञान भी मानता है. प्रति‍क्रि‍या समान बल की वि‍परीत दि‍शा में होती है. कर्म का सि‍द्धान्‍त कहता है कि‍ मन और वाणी की क्रि‍या की भी प्रति‍क्रि‍या होती है. यदि‍ आप वाणी का प्रयोग कर कि‍सी को गाली देंगे तो हो सकता है वह आपको मारने दौड़े. मन में पाप आने पर मन आपको पाप कर्म की ओर ढकेल देगा. शारीरि‍क क्रि‍या होते ही वि‍ज्ञान का नि‍यम लागू हो जायेगा. मन और वाणी की क्रि‍या को वि‍ज्ञान मापने में समर्थ नहीं है.

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नवधा भक्‍ति‍ कि‍से कहते हैं ?

नौ प्रकार की भक्‍ति‍ अर्थात् ईश्‍वर के वि‍षय में श्रवण, कीर्तन, स्‍मरण, अर्चन, वन्‍दन, आत्‍मनि‍वेदन, ईश्‍वर के प्रति‍ सख्‍य भाव, ईश्‍वर के प्रति‍ दास्‍य भाव तथा प्रत्‍येक प्राणी में ईश्‍वर का दर्शन ही नवधा भक्‍ति‍ है.

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क्‍या पुराण भ्रम उत्‍पन्‍न करते हैं ?

अन्‍धवि‍श्‍वासी के मन में पुराण कोई भ्रम नहीं उत्‍पन्‍न करते, तर्कशील के मन में पुराण संशय या भ्रम उत्‍पन्‍न करते हैं कि‍न्‍तु ज्ञानी जन पुराणों से काम की बातें मक्‍खन की तरह नि‍काल लेते हैं.

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अन्‍धवि‍श्‍वास और पाखण्‍ड को कैसे समाप्‍त कि‍या जा सकता है ?

वैज्ञानि‍क दृष्‍टि‍ अपना कर झूठ और पाखण्‍ड को समाप्‍त कि‍या जा सकता है.

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शंकराचार्य का अद्वैत क्‍या कहता है ?

शंकर का कहना है कि‍ यदि‍ पारमार्थि‍क सत्‍ता एक है तो संसार की सृष्‍टि‍ वस्‍तुत: सृष्‍टि‍ नहीं है. अवि‍द्या या माया के कारण ही एक ब्रह्म अनेक रूप में दि‍खता है. माया जादूगर की शक्‍ति‍ की तरह ईश्‍वर की ही शक्‍ति‍ है. जो सम्‍बन्‍ध आग तथा उसकी जलने की शक्‍ति‍ में है वही सम्‍बन्‍ध ईश्‍वर तथा माया में है.

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वेदान्‍त क्‍या है ?

उपनि‍षदों में वैदि‍क वि‍चारधारा वि‍कास के शि‍खर पर पहुँच गयी है. अत: उपनि‍षदों को वेदान्‍त कहा जाता है. उपनि‍षदों और बादरायण के ब्रह्मसूत्र के आधार पर जि‍स दर्शन का वि‍कास हुआ है उसे वेदान्‍त दर्शन कहते हैं.

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वेद के पुरुष तथा सांख्‍य दर्शन के पुरुष में क्‍या अन्‍तर है ?

वेद के पुरुष और ब्रह्म के वि‍राट रूप में कोई अन्‍तर नहीं है. इस प्रकार वेद के अनुसार पुरुष एक है. सांख्‍य दर्शन के अनुसार प्रत्‍येक जीव के शरीर से संपर्कित एक-एक पुरुष है. इस प्रकार सांख्‍य के अनुसार पुरुष अनेक हैं. कि‍न्‍तु वेद तथा सांख्‍य दोनों पुरुष को नि‍रपेक्ष तथा नि‍त्‍य मानते हैं. सम्‍भवत: भ्रम को दूर करने के लि‍ए उपनि‍षदों में ब्रह्म शब्‍द का अधि‍क प्रयोग कि‍या गया है.

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प्रकृति‍ के कि‍तने गुण हैं ?

तीन ‒ सत्त्व, रज, तम.

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सांख्‍य दर्शन के दो प्रमुख तत्त्व क्‍या हैं ?

पुरुष और प्रकृति‍. यह दर्शन द्वैतवादी है. पुरुष चेतन है, यह नि‍त्‍य है, अपरि‍वर्तनीय है. प्रकृति‍ इस संसार का आदि‍ कारण है. यह एक नि‍त्‍य और जड़ वस्‍तु है कि‍न्‍तु सदा परि‍वर्तनशील है.

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न्‍याय दर्शन कि‍तने प्रमाण मानता है ?

प्रत्‍यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्‍द ये चार प्रमाण हैं.

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वेद के ज्ञान-काण्‍ड पर आधारि‍त दर्शन कौन सा है ?

वेदान्‍त.

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कर्मकाण्‍ड पर आधारि‍त दर्शन कौन सा है ?

मीमांसा.

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नास्‍ति‍क कि‍से कहते हैं ?

ईश्‍वर के अस्‍ति‍त्‍व को न मानने वाला नास्‍ति‍‍क कहलाता है. भारतीय दर्शन में वेदों को न मानने वाले अर्थात् चार्वाक, बौद्ध तथा जैन नास्‍ति‍क दर्शन हैं.

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आस्‍ति‍क दर्शन कि‍न्‍हें कहा जाता है ?

षड्दर्शन अर्थात् न्‍याय, वैशेषि‍क, सांख्‍य, योग, मीमांसा तथा वेदान्‍त आस्‍ति‍क दर्शन कहे जाते हैं.

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आस्‍ति‍क कि‍से कहते हैं ?

ईश्‍वर में वि‍श्‍वास रखने वाले को आस्‍ति‍क कहते हैं. भारतीय दर्शन के अध्‍ययन में वेदों को मानने वाले दर्शन आस्‍ति‍क कहे जाते हैं.

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आत्‍मरक्षण की प्रवृत्‍ति‍ सभी जीवों में होती है इसे वि‍ज्ञान मानता है. ऐसा होने का कारण क्‍या है ?

उपनि‍षदों का कहना है कि‍ जीवन इसलि‍ए इतना प्रि‍य है कि‍ यह आनन्‍दमय है. यदि‍ जीवन में आनन्‍द नहीं रहता तो इसे कौन चाहता.

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सभी सुखों का मूल स्रोत कौन है ?

ब्रह्म ही सभी सुखों का मूल स्रोत है. समस्‍त सांसारि‍क आनन्‍द उसी के क्षुद्र कण हैं. (बृहदारण्‍यक उपनि‍षद्)

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हिन्दुत्व का संदेश क्या है ?

सह नाववतु सह नौ भुनक्तु। सह वीर्य करवावहै
तेजस्वि नावधीतमस्तु ! मा विद्विषावहै।
शान्ति: शान्ति: शान्ति:

करें परस्पर रक्षा हम प्रभु मिलकर मौज मनायें।
साथ - साथ सामर्थ्य बढ़ाकर तेजस्वी कहलायें।
विद्या-बुद्धि बढा कर जग से हम विद्वेष भगायें।
ऐसी कृपा करो परमेश्वर परम शान्ति हम पायें।

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हिन्दुओं में 'कन्यादान' क्यों किया जाता है? क्या स्त्री को सम्पत्ति माना गया है ?

हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है. जब सभी लोग अपने परिश्रम का अन्न खाते थे तो पिता के लिए पुत्र की भांति पुत्री भी उपार्जन का साधन थी. पहले कन्या के पिता द्वारा वर पक्ष से पशुधन या अन्य प्रकार का द्रव्य लेकर ही कन्या का विवाह किया जाता था. इस प्रथा को समाप्त करने के लिए कहा गया कि कन्या का दान किया जाना चाहिए. दान का अर्थ बदले में बिना कुछ पाये देना होता है. हिन्दुओं में अधिकांश विवाह वर-कन्या के सगे सम्बंधियों द्वारा तय किए जाते हैं. अत: 'कन्यादान' शब्द का प्रयोग उचित है. हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पहले स्वयंवर की प्रथा थी जिसमें विवाह के इच्छुक युवक एकत्र होते थे तथा उनमें से मनचाहा चयन कन्या ही करती थी. जहां तक स्त्री के सम्पत्ति होने या न होने का प्रश्न है स्त्रियां अपना मूल्य बखूबी समझती हैं.

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'ॐ नम: शिवाय' उत्तम मंत्र है, किन्तु शिवलिंग की पूजा क्यों की जाती है ?

'शिव' परमात्मा के कल्याणकारी स्वरूप का नाम है और 'लिंग' का अर्थ 'प्रतीक' होता है. जो मार्ग, नियम, व्यवहार, आचरण और विचार हमें नीचता से विरत कर उच्चता की ओर ले जायें वही कल्याणकर हो सकते हैं. ऊँचाई की ओर जाता गोल स्तम्भ समतावादी एवं कल्याणकर उच्च विचारों को प्रवाहित करने वाला है.

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क्‍या कर्मकाण्‍ड के द्वारा मोक्ष की प्राप्‍ति‍ हो सकती है ?

कर्मकाण्‍ड अर्थात् यज्ञादि‍ कर्मों के सम्‍पादन से जीवन के परम पुरुषार्थ अर्थात् अमरत्‍व की प्राप्‍ति‍ नहीं हो सकती. मुण्‍डकोपनि‍षद् का कहना है कि‍ ये कर्म क्षुद्र नौकाओं के समान हैं जि‍नके द्वारा भवसागर को पार नहीं कि‍या जा सकता.

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ऋत कि‍से कहते हैं ?

वैदि‍क ऋषि‍यों का वि‍श्‍वास था कि‍ प्रकृति‍ के सभी कार्य सर्वव्‍यापी नि‍यम के अनुसार होते हैं जि‍ससे सभी जीव और वि‍षय परि‍चालि‍त होते हैं. इसे ऋत कहते हैं जि‍सके द्वारा चन्‍द्र, सूर्य आदि‍ ग्रह अपने स्‍थानों पर अवस्‍थि‍त रहते हैं. इसी ऋत के द्वारा सभी जीवों को कर्म के फल मि‍लते हैं.

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आत्‍मा, ब्रह्म और सत् में क्‍या अन्‍तर है ? सप्रमाण बताइए.

सभी का अर्थ एक सत्‍ता ही है जैसे —
  1. आत्‍मा एव इदं सर्वम् (छान्‍दोग्‍य उपनि‍षद् 7-25-2) यह आत्‍मा ही सब कुछ है.
  2. सर्वं खलु इदं ब्रह्म (छान्‍दोग्‍य उपनि‍षद्) सब कुछ नि‍श्‍चय ही यह ब्रह्म ही है.
  3. सदेव सौम्‍य इदम् अग्रे आसीत्, एकम् एवं अद्वि‍तीयम् (छान्‍दोग्‍य 6-2-1) पहले सत् ही था, अकेला और अद्वि‍तीय.
  4. अयम् आत्‍मा ब्रह्म (बृहदारण्‍यक उपनि‍षद् 2-5-19) यह आत्‍मा ही ब्रह्म है.
  5. एकं सद् वि‍प्रा बहुधा वदन्‍ति‍ (ऋग्‍वेद)

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धर्म और अधर्म क्‍या बोध कराते हैं और क्‍या प्रदान करते हैं ?

धर्म पुण्‍य का और अधर्म पाप का बोध कराता है. धर्म से सुख की तथा अधर्म से दु:ख की प्राप्‍ति‍ होती है.

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पंच महाभूतों के गुण क्‍या हैं ?

महाभूत
गुण
वि‍शि‍ष्‍ट गुण
आकाश
शब्‍द
शब्‍द
वायु
शब्‍द, स्‍पर्श
स्‍पर्श
अग्‍नि
शब्‍द, स्‍पर्श, रूप
रूप
जल
शब्‍द, स्‍पर्श, रूप, रस
रस
पृथ्‍वी
शब्‍द, स्‍पर्श, रूप, रस, गन्‍ध
गन्‍ध

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शरीर का र्नि‍माण कि‍न पंच महाभूतों से होता है ?

आकाश, वायु, अग्‍नि, जल, पृथ्‍वी.

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पांच कर्मेन्‍द्रि‍यों के सम्‍पादि‍त कार्य क्‍या हैं ?

कर्मेन्‍द्रि‍य
सम्‍पादि‍त कार्य
मुख
वाक् (बोलना)
हाथ
ग्रहण (कि‍सी वस्‍तु को पकड़ना)
पैर
गमन (चलना)
गुदा
मल-नि‍स्‍सारण
जननेन्‍द्रि‍य
जनन
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परमेश्‍वर को भगवान क्‍यों कहते हैं ?

इन छ: का नाम है भग — समग्र ऐश्‍वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्‍य. इनसे वि‍भूषि‍त होने के कारण परमेश्‍वर को भगवान कहा जाता है.

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वेद के अनुसार सृष्‍टि‍ के पूर्व की क्‍या स्‍थि‍ति‍ थी ?

‘तम आसीत् तमस गूढ़मग्रे’ अर्थात् पहले अन्‍धकार अन्‍धकार में छि‍पा हुआ था जैसे बादल पर बादल छा जाय.

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हि‍न्‍दुओं के वि‍भि‍न्‍न सम्‍प्रदायों में ऐक्‍य के तत्त्व क्‍या हैं ?

वेद, ईश्‍वर, आत्‍मा और जगत् में वि‍श्‍वास.

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पाखण्‍डी आजकल क्‍या कर रहे हैं ?

देश के प्रसि‍द्ध मन्‍दि‍रों में बैठ कर मूर्ति‍यों के भोग अथवा नि‍त्‍य वि‍वाह में इतना समय लगा रहे हैं कि‍ श्रद्धालु दर्शन करने के लि‍ए लम्‍बी लाइन लगाने और अति‍रि‍क्‍त धन खर्च करने के लि‍ए बाध्‍य हो जायँ. वे गुरु जी बन कर मूर्ख शि‍ष्‍यों को अपने नये सम्‍प्रदाय का सदस्‍य बना रहे हैं या कथावाचक के रूप में झूठ का प्रचार कर रहे हैं.

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शैव, वैष्‍णव, शाक्‍त और गाणपत्‍य सम्‍प्रदायों को एकता के सूत्र में कैसे बांधा जा सकता है ?

जहां तक श्रद्धालुओं का प्रश्‍न है वे समान श्रद्धा से वि‍ष्‍णु, शि‍व, दुर्गा, गणपति‍ आदि‍ के मन्‍दि‍रों में जाते हैं. केवल यह बताने की आवश्‍यकता है कि‍ ब्रह्मा, वि‍ष्‍णु, शि‍व, रुद्र, गणपति‍, पशुपति‍, स्‍कन्‍द, सरस्‍वती, लक्ष्‍मी, दुर्गा,पार्वती, काली आदि‍ नाम एक ही परमेश्‍वर के नाम हैं. पुराण वेद के वि‍रुद्ध जाकर एक ही परमात्‍मा के गुणवाचक नामों को भि‍न्‍न-भि‍न्‍न मूर्त रूप प्रदान करते हैं और वैवाहि‍क सम्‍बन्‍ध स्‍थापि‍त करते हैं. पुराणों के स्‍थान पर वेदों का महत्‍व बढ़ा दो, वि‍भि‍न्‍न सम्‍प्रदाय स्‍वत: ही मि‍ट जायेंगे.

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ब्रह्मा की पूजा क्‍यों नहीं की जाती ?

सर्जक के रूप में ईश्‍वर को ब्रह्मा या प्रजापति‍ कहा जाता है. इस नाम से उसकी स्‍तुति‍ वेद में की गयी है. वैदि‍क काल में मन्‍दि‍रों का र्नि‍माण नहीं होता था. बाद में वि‍ष्‍णु, शि‍व और शक्‍ति‍ के रूप को महत्‍व देते हुए वैष्‍णव, शैव और शाक्‍त सम्‍प्रदाय खड़े हो गये और इन सम्‍प्रदायों ने ही मन्‍दि‍रों का र्नि‍माण कराया. ब्रह्मा के नाम से कोई सम्‍प्रदाय नहीं खड़ा हुआ, अत: न तो ब्रह्मा के मन्‍दि‍र बने और न उनकी पूजा ही होती है. एक बार सृजन हो जाने के बाद क्रि‍या और प्रति‍क्रि‍या का कर्म का सि‍द्धान्‍त लागू हो जाता है तथा वि‍श्‍व की प्रत्‍येक शक्‍ति‍ या वि‍श्‍व के प्रत्‍येक तत्त्व को नि‍यम का पालन करना होता है. पैदा होने के बाद मनुष्‍य को संरक्षण, धन, शक्‍ति‍ अथवा मृत्‍यु-भय से मुक्‍ति‍ चाहि‍ए और वह वि‍कल्‍प होने पर अपने प्रि‍य नामों को चुन लेता है. इसीलि‍ए संरक्षण के लि‍ए वि‍ष्‍णु नाम, धन के लि‍ए लक्ष्‍मी नाम, शक्‍ति‍ के लि‍ए दुर्गा नाम आदि‍ अधि‍क लोकप्रि‍य हो गये हैं. महाभारत का शान्‍ति‍ पर्व कहता है कि‍ ब्रह्मा सब प्राणि‍यों के प्रति‍ समभाव रखते हैं. दण्‍ड या वध का भय न होने से कोई उन्‍हें नहीं पूजता.

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मृत्‍यु के पश्‍चात् आत्‍मा कहाँ नि‍वास करती है ?

आत्‍मा न तो स्‍थान घेरती है और न ही उसका कोई आकार होता है. जो वस्‍तु स्‍थान नहीं घेरती और नि‍राकार होती है वह अनन्‍त में नि‍वास करती है. इस प्रकार मृत्‍यु के पश्‍चात् आत्‍मा या तो अनन्‍त में नि‍वास करती है या कि‍सी अन्‍य शरीर में प्रवेश कर जाती है.

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सफलता के चार प्रमुख स्‍तम्‍भ क्‍या हैं ?

संकल्‍प, सत्‍यनि‍ष्‍ठा, समझ और सन्‍मार्ग.

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नि‍राशा से बचने के लि‍ए क्‍या करना चाहि‍ए ?

आशा के अनुरूप फल न मि‍लने पर नि‍राशा उत्‍पन्‍न होती है. अत: यथोचि‍त कर्म करते रहने पर भी कम से कम फल की आशा रखनी चाहि‍ए.

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धार्मि‍क पूजा-पद्धति‍ का उदय कैसे हुआ ?

अपने पूर्वजों या पि‍तरों की पूजा से अथवा प्राकृति‍क शक्‍ति‍यों जैसे सूर्य, चन्‍द्र, जल, वायु आदि‍ की पूजा से उनका मानवीकरण करके अथवा यथावत्.

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प्रेम के लि‍ए सबसे आवश्‍यक तत्त्व क्‍या है ?

अहंकार का त्‍याग.

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वि‍श्‍व धर्म क्‍या है ?

स्‍वस्‍थ आचरण, करुणा, दान, पवि‍त्रता, सादा जीवन, अहंकार का त्‍याग, सत्‍य-पालन, ईमान, सह-अस्‍ति‍त्‍व सभी धर्म सि‍खाते हैं. यही वि‍श्‍व धर्म है.

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वेद में मूर्ति‍ पूजा के वि‍षय में क्‍या कहा गया है ?

यजुर्वेद के बत्‍तीसवें अध्‍याय में परमात्‍मा के वि‍षय में कहा गया है कि‍ अग्‍नि‍ वही है, आदि‍त्‍य वही है, वायु, चन्‍द्र और शुक्र वही है, जल, प्रजापति‍ और सर्वत्र भी वही है. वह प्रत्‍यक्ष नहीं देखा जा सकता है. उसकी कोई प्रति‍मा नहीं है (न तस्‍य प्रति‍मा). उसका नाम ही अत्‍यन्‍त महान है. वह सब दि‍शाओं को व्‍याप्‍त कर स्‍थि‍त है. स्‍पष्‍ट है कि‍ वेद के अनुसार ईश्‍वर की न तो कोई प्रति‍मा या मूर्ति‍ है और न ही उसे प्रत्‍यक्ष रूप में देखा जा सकता है. कि‍सी मूर्ति‍ में ईश्‍वर के बसने या ईश्‍वर का प्रत्‍यक्ष दर्शन करने का कथन वेदसम्‍मत नहीं है.

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जब स्‍वर्ग कहीं नहीं है तो कि‍सी के मरने पर यह क्‍यों कहा जाता है कि‍ उसका स्‍वर्गवास हो गया ?

संस्‍कृत में स्‍व: का अर्थ आत्‍मा होता है तथा ग का अर्थ होता है जाने वाला, ठहरने वाला या शेष रहने वाला. जब शरीर का अवसान होता है तो आत्‍मा आत्‍मलोक में ही वास करता है. इसलि‍ए मरने पर कि‍सी के लि‍ए कहा जाता है कि‍ उसका देहावसान या स्‍वर्गवास हो गया. यहॉं स्‍वर्ग का तात्‍पर्य आत्‍मा के ठहरने के लोक से है. स्‍थान न घेरने के कारण इसका भौति‍क अस्‍ति‍त्‍व नहीं है.

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स्‍वाहा शब्‍द का क्‍या अर्थ है ?

स्‍वाहा शब्‍द संस्‍कृत के ‘सु’ उपसर्ग तथा ‘आह्वे’ धातु से बना है. ‘सु’ उपसर्ग ‘अच्‍छा या सुन्‍दर या ठीक प्रकार से’ का बोध कराने के लि‍ए शब्‍द या धातु के साथ जोड़ा जाता है. ‘आह्वे’ का अर्थ बुलाना होता है. यज्ञ करते समय कि‍सी देवता को उचि‍त रीति‍ से आदरपूर्वक बुलाने के लि‍ए स्‍वाहा शब्‍द का प्रयोग कि‍या जाता है. संस्‍कृत व्‍याकरण में नम:, स्‍वस्‍ति‍, स्‍वाहा के साथ चतुर्थी या सम्‍प्रदान कारक का प्रयोग होता है. इसीलि‍ए कहा जाता है ‘अग्‍नये स्‍वाहा’ ‘नम: शि‍वाय’ आदि‍. यजुर्वेद में स्‍वाहा शब्‍द का बहुत प्रयोग हुआ है क्‍योंकि‍ इसमें यज्ञ करने की रीति‍ बतायी गयी है.

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वि‍ज्ञान और अध्‍यात्‍म मि‍ल जायें तो क्‍या होगा ?

वि‍ज्ञान का कार्य भौति‍क पदार्थों से वि‍श्‍व को जोड़ना है और अध्‍यात्‍म का कार्य मानसि‍क रूप से वि‍श्‍व को जोड़ना है. दोनों के मि‍लन से शि‍व अर्थात् कल्‍याण की उत्‍पत्‍ति‍ होगी.

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क्‍या अध्‍यात्‍म और वि‍श्‍व प्रेम में नि‍कट सम्‍बन्‍ध है ?

ब्रह्म के वि‍राट रूप अर्थात् वि‍श्‍व से प्रेम करना ही अध्‍यात्‍म है.

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लैंगि‍क असमानता को कैसे कम कि‍या जा सकता है ?

सम्‍बद्ध समाज की सोच में परि‍वर्तन लाकर.

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तान्‍त्रि‍क और ओझा अपने कुकृत्‍य में क्‍यों सफल हो जाते हैं ?

लोगों की अज्ञानता, लोभ और अन्‍धवि‍श्‍वास के कारण.

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क्‍या तप के द्वारा अलौकि‍क शक्‍ति‍ प्राप्‍त की जा सकती है ?

नहीं.

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भारतीय समाज की सबसे बड़ी वि‍डम्‍बना क्‍या है ?

वि‍वाह में धन की बरबादी.

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क्‍या समान नागरि‍क संहि‍ता तथा वि‍वाह पंजीयन से महि‍लाओं के उत्‍पीड़न में कमी आयेगी ?

हाँ.

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धर्म के नाम पर हत्‍या और आगजनी जैसी घटनाएँ क्‍यों होती हैं ?

अज्ञानता के कारण. अज्ञानता ही धार्मि‍क उन्‍माद उत्‍पन्‍न करती है.

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सामाजि‍क जीवन में आ रही वि‍कृति‍ जैसे बलात्‍कार की घटनाओं में वृद्धि‍ आदि‍ का सबसे बड़ा कारण क्‍या है ?

शराब और अन्‍य नशीले पदार्थों का सेवन.

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तलाकों का प्रति‍शत क्‍यों बढ़ रहा है ?

भौति‍क सुखों के पीछे भागने तथा असहनशीलता में वृद्धि‍ के कारण.

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क्‍या माला जपना अच्‍छा और सार्थक काम है ?

जि‍नके पास करने को कोई काम नहीं है वे यदि‍ माला जपते हैं तो इसमें बुराई क्‍या है.

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कर्मकाण्‍ड क्‍या संस्‍कृति‍ का हि‍स्‍सा बन सकता है ?

जो कर्मकाण्‍ड लोगों में प्रेम और वि‍श्‍वास पैदा करने वाला होता है वही संस्‍कृति‍ का हि‍स्‍सा बनता है.

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सब झगड़ों के मूल कारण क्‍या हैं ?

काम, क्रोध, लोभ, मोह.

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साम्‍प्रदायि‍क झगड़े कब समाप्‍त होंगे ?

जब धर्म के मौलि‍क रहस्‍य को लोग समझ जायेंगे और कि‍सी प्रलोभन या बहकावे में नहीं आयेंगे तब.

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क्‍या हि‍न्‍दू धर्म में अन्‍तर्जातीय वि‍वाह की मनाही नहीं है ?

हि‍न्‍दू भि‍न्‍न जाति‍ ही नहीं भि‍न्‍न धर्म की स्‍त्री से भी वि‍वाह कर सकता है. मूल समस्‍या समाज की है. अल्‍पवि‍कसि‍त समाज के परि‍वर्तन में समय लगेगा.

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दलि‍तों को कि‍सने जन्‍म दि‍या ?

कुकर्मी पुजारि‍यों ने वि‍लासी या मूर्ख राजाओं के सहयोग से लोगों को दलि‍त बनाया.

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क्‍या हि‍न्‍दू बनने के लि‍ए जनेऊ पहनना आवश्‍यक है ?

जनेऊ पहनना आवश्‍यक नहीं है.

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जि‍स मन्‍दि‍र में दलि‍तों को प्रवेश न मि‍ले उसे कौन सा वि‍शि‍ष्‍ट नाम दें ?

पाप का अड्डा.

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ईश्‍वर या देवता कुमारी कन्‍याओं को क्‍यों गर्भवती बनाता है ? उनसे पुत्र ही क्‍यों उत्‍पन्‍न होता है, पुत्री क्‍यों नहीं ?

पुरुष प्रधान समाज में पुरुष ही महान या शक्‍ति‍शाली बनता रहा है. अब यदि‍ उसका जन्‍म कि‍सी कुमारी से हुआ है तो उसे देवत्‍व प्रदान करने के लि‍ए यह कह दि‍या गया कि‍ गर्भ कि‍सी देवता के कारण ठहरा है. सृष्‍टि‍ में हर माता की कोख पूज्‍य है.

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पशु-पक्षी की बलि‍ या मानव-अंगों की बलि‍ से क्‍या ईश्‍वर प्रसन्‍न होता है ?

ईश्‍वर के नाम पर कि‍सी प्रकार से जीवों की बलि‍ देना महापाप है.

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ईश्‍वर की अवधारणा का सबसे कमजोर पक्ष कौन सा है ?

श्रद्धालुओं का वह वर्ग जो ईश्‍वर को राजा तथा स्‍वयं को कर देने वाली प्रजा या दास के रूप में समझता है.

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जाति‍यॉं कैसे उत्‍पन्‍न हुईं ?

श्रम-वि‍भाजन, श्रम के वि‍शेषीकरण और कुल-परम्‍परा को आगे बढ़ाने की ललक तथा स्‍थान वि‍शेष से पहचान कायम रखने की इच्‍छा ने वि‍श्‍व भर में जाति‍यों को जन्‍म दि‍या.

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दाम्‍पत्‍य जीवन में मि‍ठास कैसे भरी जा सकती है ?

आपसी समझ और वि‍श्‍वास में वृद्धि‍ करके.

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सौभाग्‍य और दुर्भाग्‍य क्‍या है ?

आशा से अधि‍क अपने पक्ष में फल मि‍ल जाना सौभाग्‍य तथा वि‍परीत परि‍स्‍थि‍ति‍यों में वि‍परीत फल मि‍लना दुर्भाग्‍य है.

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भौति‍कवादी और अध्‍यात्‍मवादी में क्‍या अन्‍तर है ?

भौति‍कवादी की पहुँच ब्रह्म के शरीर या वि‍श्‍व के भौति‍क पदार्थों में नि‍हि‍त आनन्‍द तक सीमि‍त होती है. अध्‍यात्‍मवादी की पहुँच ब्रह्म के मन तक होती है और वह इन्‍द्रि‍य-वि‍षयों से भि‍न्‍न आनन्‍द प्राप्‍त कर लेता है.

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क्‍या व्‍यास ने वेद को चार भागों में बाँटा ?

पुराणों में ही लि‍खा है कि‍ पहले वेद को तीन भागों – ऋग्‍वेद, यजुर्वेद व सामवेद में बाँटा गया जि‍से वेदत्रयी कहा जाता था. वेद में भी प्राय: तीन वेद का संकेत कि‍या गया है. वेद का वि‍भाजन राम के जन्‍म के पूर्व पुरूरवा के समय में हो गया था. बाद में अथर्व वेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया. इस प्रकार वेद के संकलन में व्‍यास का कोई योगदान नहीं है.

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क्‍या गणेश ने व्‍यास के लि‍ए लेखक का काम कि‍या ?

वेद के अनुसार शि‍व या गणेश या गणपति‍ एक ही ईश्‍वर के नाम हैं. नि‍राकार ईश्‍वर कि‍सी व्‍यक्‍ति‍ का लेखक क्‍यों बनेगा.

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परमार्थ क्‍या है ?

स्‍वार्थ को एक सीमा में बॉंध कर अन्‍य प्राणि‍यों के हि‍त में कार्य करना ही परमार्थ है.

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क्‍या भक्‍ति‍ और मुक्‍ति‍ ही जीवन का उद्देश्‍य है ?

प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति‍ को अपने जीवन का उद्देश्‍य नि‍र्धारि‍त करने का अधि‍कार है. ईश्‍वर भक्‍ति‍ या मुक्‍ति‍ के लि‍ए प्रेरि‍त नहीं करता.

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क्‍या प्रति‍मा में कोई शक्‍ति‍ होती है यदि‍ नहीं तो उसे शक्‍ति‍ कौन देता है ?

कि‍सी धर्मस्‍थल, समाधि‍ या प्रति‍मा में कोई शक्‍ति‍ नहीं होती. जन-श्रद्धा उसे शक्‍ति‍ देती है.

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वि‍ज्ञान यदि‍ धर्म का पालन नहीं करेगा तो क्‍या होगा ?

परमाणु बम आतंकवादि‍यों के हाथ में चला जायेगा.

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क्‍या चुड़ैल अथवा शैतान का कहीं अस्‍ति‍त्‍व है ?

दोनों में से कि‍सी का अस्‍ति‍त्‍व नहीं है.

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अधि‍कतम सुख और आनन्‍द कैसे प्राप्‍त कि‍या जा सकता है ?

भोग और वैराग्‍य में सन्‍तुलन रख कर.

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कौन सी चीज़ आसानी से मि‍ल जाती है कि‍न्‍तु उसे सँजो कर रखना कठि‍न होता है ?

ईमानदारी.

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वैराग्‍य क्‍या है ? वैराग्‍य से ऊपर क्‍या है ?

इन्‍द्रि‍य-वि‍षयों में आसक्‍ति‍ का त्‍याग वैराग्‍य है.

परोपकार में मन लगाना वैराग्‍य से ऊपर है.

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क्‍या धार्मि‍क गुरुओं में अलौकि‍क शक्‍ति‍ होती है ?

कि‍सी धार्मि‍क गुरु में अलौकि‍क शक्‍ति‍ नहीं होती.

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कि‍सी धर्मग्रन्‍थ में लि‍खी बातों तथा राष्‍ट्र हि‍त में टकराव हो तो क्‍या करना चाहि‍ए ?

सभी धर्मग्रन्‍थ समाज के हि‍त के लि‍ए बने हैं, समाज धर्मग्रन्‍थ के हि‍त के लि‍ए नहीं बना. कि‍सी भौगोलि‍क सीमा में बँधे समाज का हि‍त ही राष्‍ट्रहि‍त कहलाता है.

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क्‍या धर्मग्रन्‍थ में कहे या लि‍खे कथन ईश्‍वर प्रेरि‍त हो सकते हैं ?

धार्मि‍क वि‍चार सहि‍त समस्‍त वि‍चार मनुष्‍य के मन और बुद्धि‍ की उपज हैं.

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कौन सा धर्मग्रन्‍थ श्रेष्‍ठ है ?

जो धर्मग्रन्‍थ कि‍सी एक व्‍यक्‍ति‍ के वि‍चार के बजाय अनेक व्‍यक्‍ति‍यों के वि‍चारों का संकलन हो वह अधि‍क श्रेष्‍ठ होता है. वेद अनेक ऋषि‍यों के वि‍चारों को समावि‍ष्‍ट करता है, इसलि‍ए वेद श्रेष्‍ठ है. वैसे यह नि‍जी वि‍श्‍वास का वि‍षय है.

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धर्म और मानवता में कौन श्रेष्‍ठतर है ?

मानवता ही मानव का धर्म है.

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युवजन के लि‍ए क्‍या संदेश है ?

वर्तमान का आनन्‍द लो और भवि‍ष्‍य के लि‍ए तैयारी करो.

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अच्‍छा और बुरा क्‍या है ?

अच्‍छा और बुरा वि‍शेषण हैं जो संज्ञा के स्‍वभाव का वर्णन करते हैं. कर्म से सम्‍बद्ध होकर अच्‍छा या बुरा सापेक्ष अर्थ रखते हैं. वर्षा पकती फसल के लि‍ए बुरी तथा उगती फसल के लि‍ए अच्‍छी होती है. जो कर्म अपने मन अथवा सम्‍बद्ध समाज के अनुकूल होता है उसे अच्‍छा तथा जो कर्म अपने मन अथवा सम्‍बद्ध समाज के प्रति‍कूल होता है उसे बुरा कहा जाता है.

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सम्‍पूर्ण वि‍श्‍व एक होने की प्रक्रि‍या में है. वि‍श्‍व में आध्‍यात्‍मि‍क एकता नि‍र्धारि‍त करने वाले तत्त्व क्‍या होंगे ?

एकेश्‍वरवाद, सत्‍य, सौमनस्‍य और सदाचरण.

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योग से क्‍या तात्‍पर्य है ?

योग शब्‍द संस्‍कृत की युज् धातु से बना है जि‍सका अर्थ है जोड़ना. अध्‍यात्‍म में इसके द्वारा साधक शरीर को आत्‍मा से जोड़ते हैं और वैयक्‍ति‍क आत्‍मा को वि‍श्‍वात्‍मा से एकाकार करते हैं.

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कि‍सी मांगलि‍क कार्य के प्रारम्‍भ करने पर ‘गणेशाय नम:’ क्‍यों कहा या लि‍खा जाता है ?

यजुर्वेद के अनुसार शि‍व ही गणपति‍ या गणेश हैं. मंगल की कामना से ऐसा कि‍या जाता है.

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शि‍व को कैलासपति‍ क्‍यों कहते हैं ?

संस्‍कृत में कै का अर्थ ध्‍वनि‍ करना तथा लास का अर्थ क्रीडा या लीला करना होता है. ईश्‍वर की लीला ध्‍वनि‍ प्रधान है. इसलि‍ए ध्‍वनि‍युक्‍त लीला का स्‍वामी होने से शि‍व को कैलासपति‍ कहा जाता है.

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क्‍या वेद में कर्म के सि‍द्धान्‍त का उल्‍लेख है ? यदि‍ नहीं तो यह कहां से प्रस्‍फुटि‍त हुआ ?

स्‍पष्‍टतया वेद में इसका उल्‍लेख नहीं है. सतपथ ब्राह्मण में सबसे पहले कर्म के सि‍द्धान्‍त का उल्‍लेख मि‍लता है. उपनि‍षदों में पुनर्जन्‍म और कर्म के सि‍द्धान्‍त को दृढ़ता प्रदान की गयी है.

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अकर्म क्‍या है ?

कर्म वि‍कर्म का संयोग पाकर अकर्म में बदल जाता है अर्थात् नि‍ष्‍पाप मन से कि‍या गया कार्य मनुष्‍य को कर्मफल भोग से नहीं बांधता.

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गीता के अनुसार वि‍कर्म का क्‍या तात्‍पर्य है ?

मन की शुद्धता के लि‍ए आवश्‍यक कर्म वि‍कर्म कहलाते हैं जैसे इच्‍छा, आसक्‍ति‍ और क्रोध पर नि‍यन्‍त्रण रखना आदि‍.

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कर्म कि‍तने प्रकार के होते हैं ?

संचि‍त कर्म, प्रारब्‍ध कर्म तथा क्रि‍यमाण कर्म ये कर्म के तीन प्रकार हैं. पूर्व जन्‍म में कि‍ये गये कर्म संचि‍त कर्म कहे जाते हैं. पूर्व जन्‍म के कर्मों में जि‍न कर्मों का फल इस जन्‍म में भोगना पड़ता है वे प्रारब्‍ध कर्म कहे जाते हैं. व्‍यक्‍ति‍ द्वारा वर्तमान जीवन में कि‍या जा रहा कर्म क्रि‍यमाण कर्म कहलाता है.

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गीता के अनुसार कर्म और उसके तत्त्व क्‍या हैं ?

गीता के अनुसार मन, वाणी तथा शरीर से की गयी सभी प्रकार की क्रि‍याऍं कर्म हैं.

कर्म के पांच तत्त्व होते हैं—
  1. कर्ता
  2. कार्य का स्‍थान
  3. साधन
  4. प्रयत्‍न
  5. भाग्‍य.

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धर्म क्‍या है ?

मानव-ईश्‍वर-सम्‍बन्‍ध की खोज तथा मानवीय मूल्‍यों का वि‍कास ही धर्म है.

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संस्‍कृति‍ क्‍या है ?

संस्‍कृति‍ सामाजि‍क जीवन का वह उत्‍तम स्‍वरूप है जि‍से समाज बचाये रखना चाहता है और जो समाज को एकजुट रखने में सहायक होता है.

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गोपी संग रास लीला का क्‍या अर्थ है ?

वेद में वि‍ष्‍णु को संसार का रक्षक होने के कारण गोप कहा गया है. संस्‍कृत में गो का अर्थ तारे, आकाश, पृथ्‍वी, प्रकाश की कि‍रण, स्‍वर्ग, मवेशी, वाणी, सूर्य, चन्‍द्रमा, गाय आदि‍ होता है. इन सबका पालनकर्ता होने से परमेश्‍वर गोप, गोपाल, गोपेन्‍द्र आदि‍ कहाता है. ईश्‍वर की माया या प्रकृति‍ गोपी या गोपि‍का कहलाती है. जैसे माया से ईश्‍वर मायापति‍ कहलाता है वैसे ही माया के पर्यायवाची शब्‍द गोपी से वह गोपीनाथ कहलाता है. रास शब्‍द का संस्‍कृत भाषा में अर्थ होता है ध्‍वनि‍ तथा लीला का अर्थ क्रीडा करना होता है. अपनी माया या गोपी के साथ परमेश्‍वर आज भी ध्‍वनि‍मय क्रीडा कर रहा है. गो का अर्थ गाय भी होने से गोप ग्‍वाले को भी तथा गोपी उसकी पत्‍नी अर्थात् ग्‍वालि‍न को भी कहते हैं. देवकीनन्‍दन कृष्‍ण को वि‍ष्‍णु का अवतार मान लेने के बाद मायापति‍ की लीला को गलत अर्थ में ले लि‍या गया. वि‍ष्‍णु की रास लीला कृष्‍ण की काम क्रीड़ा बन गयी. मूलत: कृष्‍ण नाम वि‍ष्‍णु का पर्यायवाची है. इस प्रकार कृष्‍ण नाम की महि‍मा को पुराण न्‍यून करते हैं.

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राम को रामचन्‍द्र क्‍यों कहा जाता है ?

राम का अर्थ आनन्‍द प्रदान करने वाला तथा चन्‍द्र का अर्थ आनन्‍दस्‍वरूप है. इस प्रकार रामचन्‍द्र परमेश्‍वर का बोध कराता है.

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जीवन-यापन के साधन रहने पर भी नि‍रोगी मनुष्‍य क्‍यों दु:खी हो जाता है ?

दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करके प्राय: मतुष्‍य का मन दु:खी हो जाता है.

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ऋग्‍वेद के मंत्र — ‘आ नो भद्रा: क्रतवो यन्‍तु वि‍श्‍वत:’ का क्‍या अर्थ है?

हमारे लि‍ए (न:) सभी ओर से (वि‍श्‍वत:) कल्‍याणकारी (भद्रा:) वि‍चार (क्रतव:) आयें (आयन्‍तु).