श्रम-विभाजन, श्रम के विशेषीकरण और कुल-परम्परा को आगे बढ़ाने की ललक तथा स्थान विशेष से पहचान कायम रखने की इच्छा ने विश्व भर में जातियों को जन्म दिया.
भौतिकवादी की पहुँच ब्रह्म के शरीर या विश्व के भौतिक पदार्थों में निहित आनन्द तक सीमित होती है. अध्यात्मवादी की पहुँच ब्रह्म के मन तक होती है और वह इन्द्रिय-विषयों से भिन्न आनन्द प्राप्त कर लेता है.