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वैदिक ऋषियों का विश्वास था कि प्रकृति के सभी कार्य सर्वव्यापी नियम के अनुसार होते हैं जिससे सभी जीव और विषय परिचालित होते हैं. इसे ऋत कहते हैं जिसके द्वारा चन्द्र, सूर्य आदि ग्रह अपने स्थानों पर अवस्थित रहते हैं. इसी ऋत के द्वारा सभी जीवों को कर्म के फल मिलते हैं.Labels: ऋत, ऋषि, कर्म, चन्द्र, जीव, विश्वास, विषय, वैदिक, सूर्य

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जो धर्मग्रन्थ किसी एक व्यक्ति के विचार के बजाय अनेक व्यक्तियों के विचारों का संकलन हो वह अधिक श्रेष्ठ होता है. वेद अनेक ऋषियों के विचारों को समाविष्ट करता है, इसलिए वेद श्रेष्ठ है. वैसे यह निजी विश्वास का विषय है.Labels: ऋषि, धर्मग्रन्थ, विचार, विश्वास, विषय, वेद, व्यक्ति, श्रेष्ठ, संकलन

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शरीर में इन्द्रियां श्रेष्ठ हैं, इन्द्रियों से उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषय से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धि से आत्मा या महत्तत्त्व श्रेष्ठ है, महत्तत्त्व से अव्यक्त श्रेष्ठ है और अव्यक्त से पुरुष श्रेष्ठ है. पुरुष से परे कुछ नहीं है.
(कठोपनिषद्) Labels: आत्मा, इन्द्रियाँ, पुरुष, बुद्धि, मन, विषय, शरीर, श्रेष्ठ

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जब ब्रह्म नाना जीव-विषयों से युक्त जगत् के रूप में अपने को प्रकट करता है तो यह ईश्वर की माया सामूहिक अर्थ में होने के कारण समष्टि माया कहलाती है. जब कोई प्राणी अज्ञानता के कारण जगत् को एक ब्रह्ममय देखने के बजाय अनेक जीवों और विषयों के रूप में देखता है तो वह व्यष्टि माया से ग्रस्त या अविद्या से ग्रस्त होता है. व्यवहार में पहले अर्थ में माया तथा दूसरे अर्थ में अविद्या शब्द प्रयुक्त होता है.Labels: अज्ञानता, अविद्या, जगत्, जीव, प्राणी, ब्रह्म, माया, विषय, व्यष्टि, समष्टि

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