ऋत कि‍से कहते हैं ?

वैदि‍क ऋषि‍यों का वि‍श्‍वास था कि‍ प्रकृति‍ के सभी कार्य सर्वव्‍यापी नि‍यम के अनुसार होते हैं जि‍ससे सभी जीव और वि‍षय परि‍चालि‍त होते हैं. इसे ऋत कहते हैं जि‍सके द्वारा चन्‍द्र, सूर्य आदि‍ ग्रह अपने स्‍थानों पर अवस्‍थि‍त रहते हैं. इसी ऋत के द्वारा सभी जीवों को कर्म के फल मि‍लते हैं.

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भौति‍कवादी और अध्‍यात्‍मवादी में क्‍या अन्‍तर है ?

भौति‍कवादी की पहुँच ब्रह्म के शरीर या वि‍श्‍व के भौति‍क पदार्थों में नि‍हि‍त आनन्‍द तक सीमि‍त होती है. अध्‍यात्‍मवादी की पहुँच ब्रह्म के मन तक होती है और वह इन्‍द्रि‍य-वि‍षयों से भि‍न्‍न आनन्‍द प्राप्‍त कर लेता है.

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वैराग्‍य क्‍या है ? वैराग्‍य से ऊपर क्‍या है ?

इन्‍द्रि‍य-वि‍षयों में आसक्‍ति‍ का त्‍याग वैराग्‍य है.

परोपकार में मन लगाना वैराग्‍य से ऊपर है.

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कौन सा धर्मग्रन्‍थ श्रेष्‍ठ है ?

जो धर्मग्रन्‍थ कि‍सी एक व्‍यक्‍ति‍ के वि‍चार के बजाय अनेक व्‍यक्‍ति‍यों के वि‍चारों का संकलन हो वह अधि‍क श्रेष्‍ठ होता है. वेद अनेक ऋषि‍यों के वि‍चारों को समावि‍ष्‍ट करता है, इसलि‍ए वेद श्रेष्‍ठ है. वैसे यह नि‍जी वि‍श्‍वास का वि‍षय है.

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कौन श्रेष्‍ठ है ?

शरीर में इन्‍द्रि‍यां श्रेष्‍ठ हैं, इन्‍द्रि‍यों से उनके वि‍षय श्रेष्‍ठ हैं, वि‍षय से मन श्रेष्‍ठ है, मन से बुद्धि‍ श्रेष्‍ठ है, बुद्धि‍ से आत्‍मा या महत्तत्त्व श्रेष्‍ठ है, महत्तत्त्व से अव्‍यक्‍त श्रेष्‍ठ है और अव्‍यक्‍त से पुरुष श्रेष्‍ठ है. पुरुष से परे कुछ नहीं है.
(कठोपनि‍षद्)

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माया के समष्‍टि‍ रूप तथा व्‍यष्‍टि‍ रूप से क्‍या तात्‍पर्य है ?

जब ब्रह्म नाना जीव-वि‍षयों से युक्‍त जगत् के रूप में अपने को प्रकट करता है तो यह ईश्‍वर की माया सामूहि‍क अर्थ में होने के कारण समष्‍टि‍ माया कहलाती है. जब कोई प्राणी अज्ञानता के कारण जगत् को एक ब्रह्ममय देखने के बजाय अनेक जीवों और वि‍षयों के रूप में देखता है तो वह व्‍यष्‍टि‍ माया से ग्रस्‍त या अवि‍द्या से ग्रस्‍त होता है. व्‍यवहार में पहले अर्थ में माया तथा दूसरे अर्थ में अवि‍द्या शब्‍द प्रयुक्‍त होता है.

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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