वेद के पुरुष तथा सांख्‍य दर्शन के पुरुष में क्‍या अन्‍तर है ?

वेद के पुरुष और ब्रह्म के वि‍राट रूप में कोई अन्‍तर नहीं है. इस प्रकार वेद के अनुसार पुरुष एक है. सांख्‍य दर्शन के अनुसार प्रत्‍येक जीव के शरीर से संपर्कित एक-एक पुरुष है. इस प्रकार सांख्‍य के अनुसार पुरुष अनेक हैं. कि‍न्‍तु वेद तथा सांख्‍य दोनों पुरुष को नि‍रपेक्ष तथा नि‍त्‍य मानते हैं. सम्‍भवत: भ्रम को दूर करने के लि‍ए उपनि‍षदों में ब्रह्म शब्‍द का अधि‍क प्रयोग कि‍या गया है.

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वेद के ज्ञान-काण्‍ड पर आधारि‍त दर्शन कौन सा है ?

वेदान्‍त.

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आस्‍ति‍क कि‍से कहते हैं ?

ईश्‍वर में वि‍श्‍वास रखने वाले को आस्‍ति‍क कहते हैं. भारतीय दर्शन के अध्‍ययन में वेदों को मानने वाले दर्शन आस्‍ति‍क कहे जाते हैं.

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वेद के अनुसार सृष्‍टि‍ के पूर्व की क्‍या स्‍थि‍ति‍ थी ?

‘तम आसीत् तमस गूढ़मग्रे’ अर्थात् पहले अन्‍धकार अन्‍धकार में छि‍पा हुआ था जैसे बादल पर बादल छा जाय.

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हि‍न्‍दुओं के वि‍भि‍न्‍न सम्‍प्रदायों में ऐक्‍य के तत्त्व क्‍या हैं ?

वेद, ईश्‍वर, आत्‍मा और जगत् में वि‍श्‍वास.

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शैव, वैष्‍णव, शाक्‍त और गाणपत्‍य सम्‍प्रदायों को एकता के सूत्र में कैसे बांधा जा सकता है ?

जहां तक श्रद्धालुओं का प्रश्‍न है वे समान श्रद्धा से वि‍ष्‍णु, शि‍व, दुर्गा, गणपति‍ आदि‍ के मन्‍दि‍रों में जाते हैं. केवल यह बताने की आवश्‍यकता है कि‍ ब्रह्मा, वि‍ष्‍णु, शि‍व, रुद्र, गणपति‍, पशुपति‍, स्‍कन्‍द, सरस्‍वती, लक्ष्‍मी, दुर्गा,पार्वती, काली आदि‍ नाम एक ही परमेश्‍वर के नाम हैं. पुराण वेद के वि‍रुद्ध जाकर एक ही परमात्‍मा के गुणवाचक नामों को भि‍न्‍न-भि‍न्‍न मूर्त रूप प्रदान करते हैं और वैवाहि‍क सम्‍बन्‍ध स्‍थापि‍त करते हैं. पुराणों के स्‍थान पर वेदों का महत्‍व बढ़ा दो, वि‍भि‍न्‍न सम्‍प्रदाय स्‍वत: ही मि‍ट जायेंगे.

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ब्रह्मा की पूजा क्‍यों नहीं की जाती ?

सर्जक के रूप में ईश्‍वर को ब्रह्मा या प्रजापति‍ कहा जाता है. इस नाम से उसकी स्‍तुति‍ वेद में की गयी है. वैदि‍क काल में मन्‍दि‍रों का र्नि‍माण नहीं होता था. बाद में वि‍ष्‍णु, शि‍व और शक्‍ति‍ के रूप को महत्‍व देते हुए वैष्‍णव, शैव और शाक्‍त सम्‍प्रदाय खड़े हो गये और इन सम्‍प्रदायों ने ही मन्‍दि‍रों का र्नि‍माण कराया. ब्रह्मा के नाम से कोई सम्‍प्रदाय नहीं खड़ा हुआ, अत: न तो ब्रह्मा के मन्‍दि‍र बने और न उनकी पूजा ही होती है. एक बार सृजन हो जाने के बाद क्रि‍या और प्रति‍क्रि‍या का कर्म का सि‍द्धान्‍त लागू हो जाता है तथा वि‍श्‍व की प्रत्‍येक शक्‍ति‍ या वि‍श्‍व के प्रत्‍येक तत्त्व को नि‍यम का पालन करना होता है. पैदा होने के बाद मनुष्‍य को संरक्षण, धन, शक्‍ति‍ अथवा मृत्‍यु-भय से मुक्‍ति‍ चाहि‍ए और वह वि‍कल्‍प होने पर अपने प्रि‍य नामों को चुन लेता है. इसीलि‍ए संरक्षण के लि‍ए वि‍ष्‍णु नाम, धन के लि‍ए लक्ष्‍मी नाम, शक्‍ति‍ के लि‍ए दुर्गा नाम आदि‍ अधि‍क लोकप्रि‍य हो गये हैं. महाभारत का शान्‍ति‍ पर्व कहता है कि‍ ब्रह्मा सब प्राणि‍यों के प्रति‍ समभाव रखते हैं. दण्‍ड या वध का भय न होने से कोई उन्‍हें नहीं पूजता.

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वेद में मूर्ति‍ पूजा के वि‍षय में क्‍या कहा गया है ?

यजुर्वेद के बत्‍तीसवें अध्‍याय में परमात्‍मा के वि‍षय में कहा गया है कि‍ अग्‍नि‍ वही है, आदि‍त्‍य वही है, वायु, चन्‍द्र और शुक्र वही है, जल, प्रजापति‍ और सर्वत्र भी वही है. वह प्रत्‍यक्ष नहीं देखा जा सकता है. उसकी कोई प्रति‍मा नहीं है (न तस्‍य प्रति‍मा). उसका नाम ही अत्‍यन्‍त महान है. वह सब दि‍शाओं को व्‍याप्‍त कर स्‍थि‍त है. स्‍पष्‍ट है कि‍ वेद के अनुसार ईश्‍वर की न तो कोई प्रति‍मा या मूर्ति‍ है और न ही उसे प्रत्‍यक्ष रूप में देखा जा सकता है. कि‍सी मूर्ति‍ में ईश्‍वर के बसने या ईश्‍वर का प्रत्‍यक्ष दर्शन करने का कथन वेदसम्‍मत नहीं है.

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क्‍या व्‍यास ने वेद को चार भागों में बाँटा ?

पुराणों में ही लि‍खा है कि‍ पहले वेद को तीन भागों – ऋग्‍वेद, यजुर्वेद व सामवेद में बाँटा गया जि‍से वेदत्रयी कहा जाता था. वेद में भी प्राय: तीन वेद का संकेत कि‍या गया है. वेद का वि‍भाजन राम के जन्‍म के पूर्व पुरूरवा के समय में हो गया था. बाद में अथर्व वेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया. इस प्रकार वेद के संकलन में व्‍यास का कोई योगदान नहीं है.

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क्‍या गणेश ने व्‍यास के लि‍ए लेखक का काम कि‍या ?

वेद के अनुसार शि‍व या गणेश या गणपति‍ एक ही ईश्‍वर के नाम हैं. नि‍राकार ईश्‍वर कि‍सी व्‍यक्‍ति‍ का लेखक क्‍यों बनेगा.

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कौन सा धर्मग्रन्‍थ श्रेष्‍ठ है ?

जो धर्मग्रन्‍थ कि‍सी एक व्‍यक्‍ति‍ के वि‍चार के बजाय अनेक व्‍यक्‍ति‍यों के वि‍चारों का संकलन हो वह अधि‍क श्रेष्‍ठ होता है. वेद अनेक ऋषि‍यों के वि‍चारों को समावि‍ष्‍ट करता है, इसलि‍ए वेद श्रेष्‍ठ है. वैसे यह नि‍जी वि‍श्‍वास का वि‍षय है.

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क्‍या वेद में कर्म के सि‍द्धान्‍त का उल्‍लेख है ? यदि‍ नहीं तो यह कहां से प्रस्‍फुटि‍त हुआ ?

स्‍पष्‍टतया वेद में इसका उल्‍लेख नहीं है. सतपथ ब्राह्मण में सबसे पहले कर्म के सि‍द्धान्‍त का उल्‍लेख मि‍लता है. उपनि‍षदों में पुनर्जन्‍म और कर्म के सि‍द्धान्‍त को दृढ़ता प्रदान की गयी है.

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गोपी संग रास लीला का क्‍या अर्थ है ?

वेद में वि‍ष्‍णु को संसार का रक्षक होने के कारण गोप कहा गया है. संस्‍कृत में गो का अर्थ तारे, आकाश, पृथ्‍वी, प्रकाश की कि‍रण, स्‍वर्ग, मवेशी, वाणी, सूर्य, चन्‍द्रमा, गाय आदि‍ होता है. इन सबका पालनकर्ता होने से परमेश्‍वर गोप, गोपाल, गोपेन्‍द्र आदि‍ कहाता है. ईश्‍वर की माया या प्रकृति‍ गोपी या गोपि‍का कहलाती है. जैसे माया से ईश्‍वर मायापति‍ कहलाता है वैसे ही माया के पर्यायवाची शब्‍द गोपी से वह गोपीनाथ कहलाता है. रास शब्‍द का संस्‍कृत भाषा में अर्थ होता है ध्‍वनि‍ तथा लीला का अर्थ क्रीडा करना होता है. अपनी माया या गोपी के साथ परमेश्‍वर आज भी ध्‍वनि‍मय क्रीडा कर रहा है. गो का अर्थ गाय भी होने से गोप ग्‍वाले को भी तथा गोपी उसकी पत्‍नी अर्थात् ग्‍वालि‍न को भी कहते हैं. देवकीनन्‍दन कृष्‍ण को वि‍ष्‍णु का अवतार मान लेने के बाद मायापति‍ की लीला को गलत अर्थ में ले लि‍या गया. वि‍ष्‍णु की रास लीला कृष्‍ण की काम क्रीड़ा बन गयी. मूलत: कृष्‍ण नाम वि‍ष्‍णु का पर्यायवाची है. इस प्रकार कृष्‍ण नाम की महि‍मा को पुराण न्‍यून करते हैं.

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वेद का क्‍या अर्थ है ?

वेद शब्‍द संस्‍कृत की वि‍द् धातु से बना है जि‍सका अर्थ होता है जानना. वेद ईश्‍वरीय ज्ञान को कहते हैं.

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हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य के इति‍हास के लेखन में निर्गुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म को कि‍स अर्थ में ले लि‍या जाता है ?

हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य के इति‍हास के लेखन में भक्‍ति‍ काल को निर्गुण भक्‍ति‍ शाखा तथा सगुण भक्‍ति‍ शाखा में वि‍भाजि‍त कि‍या जाता है. कबीर जैसे कवि‍ जो नि‍राकार ईश्‍वर में वि‍श्‍वास करते हैं निर्गुण भक्‍ति‍‍ शाखा से सम्‍बन्‍धि‍त माने जाते हैं. निर्गुण ब्रह्म के उपास्‍य न होने के कारण वास्‍तव में कबीर की उपासना सगुण ब्रह्म की उपासना है. सगुण भक्‍ति‍ शाखा के कवि‍ सूरदास और तुलसीदास आदि‍ हैं जो कृष्‍ण और राम को ईश्‍वर का अवतार मानते हैं. राम और कृष्‍ण शब्‍द ईश्‍वर के पर्यायवाची हैं. इसी अर्थ में ये शब्‍द सगुण ब्रह्म के लि‍ए प्रयुक्‍त हो सकते हैं. वेद और उपनि‍षद अवतारवाद में वि‍श्‍वास नहीं करते. जो कवि‍ अवतारवाद में वि‍श्‍वास करते हैं वे वास्‍तव में अवतारवादी भक्‍ति‍ शाखा के कवि‍ हैं सगुण भक्‍ति‍ शाखा के कवि‍ नहीं.

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निर्गुण ब्रह्म के लिए ‘स:’ शब्‍द का प्रयोग नहीं कि‍या जाता. ऐसा क्‍यों है ?

‘स:’ शब्‍द के कहे जाने से ब्रह्म व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेष हो जाता, इससे जीव-जगत के साथ उसका सम्‍पूर्ण अलगाव सूचि‍त होता. इस‍लि‍ए स: के स्‍थान पर निर्गुण वाचक ‘तत्’ शब्‍द का प्रयोग वेदों में कि‍या गया है और तत् शब्‍द से निर्गुण ब्रह्म का प्रचार हुआ है.

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