जो धर्मग्रन्थ किसी एक व्यक्ति के विचार के बजाय अनेक व्यक्तियों के विचारों का संकलन हो वह अधिक श्रेष्ठ होता है. वेद अनेक ऋषियों के विचारों को समाविष्ट करता है, इसलिए वेद श्रेष्ठ है. वैसे यह निजी विश्वास का विषय है.
संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म तथा क्रियमाण कर्म ये कर्म के तीन प्रकार हैं. पूर्व जन्म में किये गये कर्म संचित कर्म कहे जाते हैं. पूर्व जन्म के कर्मों में जिन कर्मों का फल इस जन्म में भोगना पड़ता है वे प्रारब्ध कर्म कहे जाते हैं. व्यक्ति द्वारा वर्तमान जीवन में किया जा रहा कर्म क्रियमाण कर्म कहलाता है.
‘स:’ शब्द के कहे जाने से ब्रह्म व्यक्ति विशेष हो जाता, इससे जीव-जगत के साथ उसका सम्पूर्ण अलगाव सूचित होता. इसलिए स: के स्थान पर निर्गुण वाचक ‘तत्’ शब्द का प्रयोग वेदों में किया गया है और तत् शब्द से निर्गुण ब्रह्म का प्रचार हुआ है.