क्‍या भक्‍ति‍ और मुक्‍ति‍ ही जीवन का उद्देश्‍य है ?

प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति‍ को अपने जीवन का उद्देश्‍य नि‍र्धारि‍त करने का अधि‍कार है. ईश्‍वर भक्‍ति‍ या मुक्‍ति‍ के लि‍ए प्रेरि‍त नहीं करता.

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कौन सा धर्मग्रन्‍थ श्रेष्‍ठ है ?

जो धर्मग्रन्‍थ कि‍सी एक व्‍यक्‍ति‍ के वि‍चार के बजाय अनेक व्‍यक्‍ति‍यों के वि‍चारों का संकलन हो वह अधि‍क श्रेष्‍ठ होता है. वेद अनेक ऋषि‍यों के वि‍चारों को समावि‍ष्‍ट करता है, इसलि‍ए वेद श्रेष्‍ठ है. वैसे यह नि‍जी वि‍श्‍वास का वि‍षय है.

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कर्म कि‍तने प्रकार के होते हैं ?

संचि‍त कर्म, प्रारब्‍ध कर्म तथा क्रि‍यमाण कर्म ये कर्म के तीन प्रकार हैं. पूर्व जन्‍म में कि‍ये गये कर्म संचि‍त कर्म कहे जाते हैं. पूर्व जन्‍म के कर्मों में जि‍न कर्मों का फल इस जन्‍म में भोगना पड़ता है वे प्रारब्‍ध कर्म कहे जाते हैं. व्‍यक्‍ति‍ द्वारा वर्तमान जीवन में कि‍या जा रहा कर्म क्रि‍यमाण कर्म कहलाता है.

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ब्रह्मानुभूति‍ प्राप्‍त व्‍यक्‍ति‍ जीवि‍त रहते हुए कि‍स प्रकार कर्मरत रह सकता है ?

अनासक्‍त कर्म करके ऐसा व्‍यक्‍ति‍ बन्‍धन में नहीं फँसता. ऐसे व्‍यक्‍ति‍ को अन्‍य जीवों के उपकारार्थ नि‍:स्‍वार्थ कर्म करना चाहि‍ए.

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निर्गुण ब्रह्म के लिए ‘स:’ शब्‍द का प्रयोग नहीं कि‍या जाता. ऐसा क्‍यों है ?

‘स:’ शब्‍द के कहे जाने से ब्रह्म व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेष हो जाता, इससे जीव-जगत के साथ उसका सम्‍पूर्ण अलगाव सूचि‍त होता. इस‍लि‍ए स: के स्‍थान पर निर्गुण वाचक ‘तत्’ शब्‍द का प्रयोग वेदों में कि‍या गया है और तत् शब्‍द से निर्गुण ब्रह्म का प्रचार हुआ है.

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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