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आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी.Labels: अग्नि, आकाश, जल, पृथ्वी, महाभूत, वायु, शरीर

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आत्मा न तो स्थान घेरती है और न ही उसका कोई आकार होता है. जो वस्तु स्थान नहीं घेरती और निराकार होती है वह अनन्त में निवास करती है. इस प्रकार मृत्यु के पश्चात् आत्मा या तो अनन्त में निवास करती है या किसी अन्य शरीर में प्रवेश कर जाती है.Labels: अनन्त, आत्मा, मृत्यु, शरीर

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संस्कृत में स्व: का अर्थ आत्मा होता है तथा ग का अर्थ होता है जाने वाला, ठहरने वाला या शेष रहने वाला. जब शरीर का अवसान होता है तो आत्मा आत्मलोक में ही वास करता है. इसलिए मरने पर किसी के लिए कहा जाता है कि उसका देहावसान या स्वर्गवास हो गया. यहॉं स्वर्ग का तात्पर्य आत्मा के ठहरने के लोक से है. स्थान न घेरने के कारण इसका भौतिक अस्तित्व नहीं है.Labels: आत्मा, शरीर, स्वर्ग

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योग शब्द संस्कृत की युज् धातु से बना है जिसका अर्थ है जोड़ना. अध्यात्म में इसके द्वारा साधक शरीर को आत्मा से जोड़ते हैं और वैयक्तिक आत्मा को विश्वात्मा से एकाकार करते हैं.Labels: अध्यात्म, आत्मा, योग, विश्वात्मा, शरीर, साधक

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गीता के अनुसार मन, वाणी तथा शरीर से की गयी सभी प्रकार की क्रियाऍं कर्म हैं.
कर्म के पांच तत्त्व होते हैं—
- कर्ता
- कार्य का स्थान
- साधन
- प्रयत्न
- भाग्य.
Labels: कर्ता, कर्म, कार्य, क्रिया, गीता, तत्त्व, प्रयत्न, भाग्य, मन, वाणी, शरीर, साधन

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शरीर में इन्द्रियां श्रेष्ठ हैं, इन्द्रियों से उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषय से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धि से आत्मा या महत्तत्त्व श्रेष्ठ है, महत्तत्त्व से अव्यक्त श्रेष्ठ है और अव्यक्त से पुरुष श्रेष्ठ है. पुरुष से परे कुछ नहीं है.
(कठोपनिषद्) Labels: आत्मा, इन्द्रियाँ, पुरुष, बुद्धि, मन, विषय, शरीर, श्रेष्ठ

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संस्कृत में आत्मा शब्द देह के लिए भी प्रयुक्त होता है. उसी अर्थ में जीव के शरीर या मन आदि से उत्पन्न दु:ख आध्यात्मिक कहलाता है. जैसे क्षुधा, क्रोध, रोग, मानसिक संताप आदि.Labels: आत्मा, आध्यात्मिक, क्रोध, क्षुधा, जीव, दु:ख, मन, मानसिक, शरीर, संताप

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