शंकराचार्य का अद्वैत क्‍या कहता है ?

शंकर का कहना है कि‍ यदि‍ पारमार्थि‍क सत्‍ता एक है तो संसार की सृष्‍टि‍ वस्‍तुत: सृष्‍टि‍ नहीं है. अवि‍द्या या माया के कारण ही एक ब्रह्म अनेक रूप में दि‍खता है. माया जादूगर की शक्‍ति‍ की तरह ईश्‍वर की ही शक्‍ति‍ है. जो सम्‍बन्‍ध आग तथा उसकी जलने की शक्‍ति‍ में है वही सम्‍बन्‍ध ईश्‍वर तथा माया में है.

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वेद के अनुसार सृष्‍टि‍ के पूर्व की क्‍या स्‍थि‍ति‍ थी ?

‘तम आसीत् तमस गूढ़मग्रे’ अर्थात् पहले अन्‍धकार अन्‍धकार में छि‍पा हुआ था जैसे बादल पर बादल छा जाय.

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ईश्‍वर या देवता कुमारी कन्‍याओं को क्‍यों गर्भवती बनाता है ? उनसे पुत्र ही क्‍यों उत्‍पन्‍न होता है, पुत्री क्‍यों नहीं ?

पुरुष प्रधान समाज में पुरुष ही महान या शक्‍ति‍शाली बनता रहा है. अब यदि‍ उसका जन्‍म कि‍सी कुमारी से हुआ है तो उसे देवत्‍व प्रदान करने के लि‍ए यह कह दि‍या गया कि‍ गर्भ कि‍सी देवता के कारण ठहरा है. सृष्‍टि‍ में हर माता की कोख पूज्‍य है.

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मनु और शतरूपा का वास्‍तवि‍क अर्थ क्‍या है ?

मनु (मन्, उच्) का अर्थ है वि‍चार से परि‍पूर्ण और प्रारम्‍भ में यह सृष्‍टि‍ के लि‍ए मननशील परमात्‍मा का अर्थ रखता था. शतरूपा यह प्रकृति‍ है जो प्रति‍ पल सैकड़ों रूप धारण करती है.

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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