शंकर का कहना है कि यदि पारमार्थिक सत्ता एक है तो संसार की सृष्टि वस्तुत: सृष्टि नहीं है. अविद्या या माया के कारण ही एक ब्रह्म अनेक रूप में दिखता है. माया जादूगर की शक्ति की तरह ईश्वर की ही शक्ति है. जो सम्बन्ध आग तथा उसकी जलने की शक्ति में है वही सम्बन्ध ईश्वर तथा माया में है. Labels: अद्वैत, अविद्या, ईश्वर, ब्रह्म, माया, शंकराचार्य, सृष्टि




