अथर्ववेद के तृतीय काण्ड के सूक्त संख्या तीस में समानता के सिद्धान्त का पहले से वर्णन है. यह सूक्त कहता है कि हे विवादी पुरुणों! गौऍं जैसे अपने वत्स से स्नेह करती हैं, वैसे ही तुम परस्पर व्यवहार करो. पुत्र पिता का अनुगत हो, माता भी पुत्र के अनुकूल मन वाली हो, पत्नी पति से मधुर वाणी बोलने वाली हो. भाग बांटने के लिए भ्राता भ्राता का बुरा न करे. बहिन-भाई से बैर न करें. यह सब भाई समान कार्य और समान गति वाले होकर मंगलमय बातें करें. तुम समान मन वाले, समान कार्य वाले रहकर छोटे-बड़े का ध्यान रखते हुए परस्पर सुन्दर वचन कहो. हे मनुष्यो! मैं तुम्हें समान कार्यों में प्रवृत्त करता हूँ. समानता के इच्छुको ! तुम्हारा अन्न-पानी का उपभोग एक सा हो. मैं तुम्हें प्रेम-सूत्र में साथ-साथ बांधता हूँ. इस प्रकार समानता का सिद्धान्त मूलत: पश्चिमी विचार नहीं है. Labels: अथर्ववेद, काण्ड, विचार, समानता, सिद्धान्त, सूक्त




