आत्‍मा, ब्रह्म और सत् में क्‍या अन्‍तर है ? सप्रमाण बताइए.

सभी का अर्थ एक सत्‍ता ही है जैसे —
  1. आत्‍मा एव इदं सर्वम् (छान्‍दोग्‍य उपनि‍षद् 7-25-2) यह आत्‍मा ही सब कुछ है.
  2. सर्वं खलु इदं ब्रह्म (छान्‍दोग्‍य उपनि‍षद्) सब कुछ नि‍श्‍चय ही यह ब्रह्म ही है.
  3. सदेव सौम्‍य इदम् अग्रे आसीत्, एकम् एवं अद्वि‍तीयम् (छान्‍दोग्‍य 6-2-1) पहले सत् ही था, अकेला और अद्वि‍तीय.
  4. अयम् आत्‍मा ब्रह्म (बृहदारण्‍यक उपनि‍षद् 2-5-19) यह आत्‍मा ही ब्रह्म है.
  5. एकं सद् वि‍प्रा बहुधा वदन्‍ति‍ (ऋग्‍वेद)

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हि‍न्‍दुओं के वि‍भि‍न्‍न सम्‍प्रदायों में ऐक्‍य के तत्त्व क्‍या हैं ?

वेद, ईश्‍वर, आत्‍मा और जगत् में वि‍श्‍वास.

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मृत्‍यु के पश्‍चात् आत्‍मा कहाँ नि‍वास करती है ?

आत्‍मा न तो स्‍थान घेरती है और न ही उसका कोई आकार होता है. जो वस्‍तु स्‍थान नहीं घेरती और नि‍राकार होती है वह अनन्‍त में नि‍वास करती है. इस प्रकार मृत्‍यु के पश्‍चात् आत्‍मा या तो अनन्‍त में नि‍वास करती है या कि‍सी अन्‍य शरीर में प्रवेश कर जाती है.

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जब स्‍वर्ग कहीं नहीं है तो कि‍सी के मरने पर यह क्‍यों कहा जाता है कि‍ उसका स्‍वर्गवास हो गया ?

संस्‍कृत में स्‍व: का अर्थ आत्‍मा होता है तथा ग का अर्थ होता है जाने वाला, ठहरने वाला या शेष रहने वाला. जब शरीर का अवसान होता है तो आत्‍मा आत्‍मलोक में ही वास करता है. इसलि‍ए मरने पर कि‍सी के लि‍ए कहा जाता है कि‍ उसका देहावसान या स्‍वर्गवास हो गया. यहॉं स्‍वर्ग का तात्‍पर्य आत्‍मा के ठहरने के लोक से है. स्‍थान न घेरने के कारण इसका भौति‍क अस्‍ति‍त्‍व नहीं है.

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योग से क्‍या तात्‍पर्य है ?

योग शब्‍द संस्‍कृत की युज् धातु से बना है जि‍सका अर्थ है जोड़ना. अध्‍यात्‍म में इसके द्वारा साधक शरीर को आत्‍मा से जोड़ते हैं और वैयक्‍ति‍क आत्‍मा को वि‍श्‍वात्‍मा से एकाकार करते हैं.

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क्‍या उपि‍नषदों में पुनर्जन्‍म को मान्‍यता दी गयी है ?

उपनि‍षदों में कर्म तथा पुनर्जन्‍म की अवधारणाओं को एक सि‍द्धान्‍त का रूप दि‍या गया है. कठोपनि‍षद् में इस वि‍चार को स्‍पष्‍ट रूप से व्‍यक्‍त कि‍या गया है कि‍ मृतक की आत्‍मा नवीन शरीर धारण करती है. आत्‍मा अपने कर्म तथा ज्ञान के अनुसार जड़ वस्‍तुओं जैसे पेड़ या पौधों का स्‍वरूप भी ग्रहण कर सकती है.

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कौन श्रेष्‍ठ है ?

शरीर में इन्‍द्रि‍यां श्रेष्‍ठ हैं, इन्‍द्रि‍यों से उनके वि‍षय श्रेष्‍ठ हैं, वि‍षय से मन श्रेष्‍ठ है, मन से बुद्धि‍ श्रेष्‍ठ है, बुद्धि‍ से आत्‍मा या महत्तत्त्व श्रेष्‍ठ है, महत्तत्त्व से अव्‍यक्‍त श्रेष्‍ठ है और अव्‍यक्‍त से पुरुष श्रेष्‍ठ है. पुरुष से परे कुछ नहीं है.
(कठोपनि‍षद्)

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शरीर और आत्‍मा के सम्‍बन्‍ध को एक रूपक से समझाइए.

शरीर रथ आत्‍मा रथी बुद्धि‍ सारथी मन लगाम तथा इन्‍द्रि‍यां घोड़े हैं.
(कठोपनि‍षद्)

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आत्‍मा कौन है ?

वह जो प्राणों में बुद्धि‍वृत्‍ति‍यों के भीतर रहने वाला वि‍ज्ञानमय ज्‍योति‍ स्‍वरूप पुरुष है वही आत्‍मा है.
(बृहदारण्‍यक उपनि‍षद्)

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आध्‍यात्‍मि‍क दु:ख कि‍से कहते हैं ?

संस्‍कृत में आत्‍मा शब्‍द देह के लि‍ए भी प्रयुक्‍त होता है. उसी अर्थ में जीव के शरीर या मन आदि‍ से उत्‍पन्‍न दु:ख आध्‍यात्‍मि‍क कहलाता है. जैसे क्षुधा, क्रोध, रोग, मानसि‍क संताप आदि‍.

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आत्‍मा कि‍स प्रकार ईश्‍वर से अभि‍न्‍न है ?

जैसे सागर की एक बूँद या सागर की एक लहर सागर से अभि‍न्‍न है, जैसे ईंधन को जला रही अग्‍नि‍ की चि‍नगारी अग्‍नि‍ से अभिन्‍न है उसी प्रकार आत्‍मा ईश्‍वर से अभि‍न्‍न है.

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अध्‍यात्‍म में जड़, स्‍थूल और सूक्ष्‍म कि‍से कहते हैं ?

चैतन्‍यरहि‍त वस्‍तुओं को जड़ कहते हैं, जैसे पत्‍थर, मि‍ट्टी आदि‍. दृश्‍यमान वस्‍तु को स्‍थूल कहा जाता है जैसे पृथ्‍वी, चन्‍द्रमा आदि‍. भौति‍क तत्‍वों से भि‍न्‍न अदृश्‍य तत्‍वों को सूक्ष्‍म कहते हैं, जैसे गुरुत्‍व बल, आत्‍मा आदि‍.

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अध्‍यात्‍म का अर्थ क्‍या है ?

अध्‍यात्‍म शब्‍द आत्‍म में अधि‍ उपसर्ग लगा कर बना है. आत्‍मा को ऊपर उठाना या आत्‍मोन्‍न‍ति‍ ही इसका अर्थ है. जो व्‍यक्‍ति‍ परमात्‍मा को सर्वत्र तथा प्रत्‍येक जीव में समान रूप से देखता है और यह समझता है कि‍ इस नश्‍वर शरीर के भीतर न तो आत्‍मा, न ही परमात्‍मा कभी भी वि‍नष्‍ट होता है वही वास्‍तव में आत्‍मोन्‍नति‍ की चरम अवस्‍था को प्राप्‍त होता है. परमात्‍मा ही समस्‍त जीवों का आदि‍, मध्‍य तथा अन्‍त है. अत: अध्‍यात्‍म वि‍द्या आत्‍मा और ईश्‍वर के सम्‍बन्‍ध को प्रकट करती है.

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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