देवासुर संग्राम से क्‍या तात्‍पर्य है ?

परमात्‍मा ने सुख प्राप्‍ति‍ के लि‍ए इन्‍द्रि‍याँ बनायी हैं. इन्‍द्रि‍यों के माध्‍यम से मन ही सुख भोगता है. स्‍मरण-शक्‍ति‍ के कारण मन पूर्व में भोगे गये सुख को याद रखता है. इस सुख को पाने के लि‍ए मन अनुचि‍त साधन भी अपना लेता है. परमात्‍मा ने मन को देवत्‍व प्रदान कि‍या है. कि‍न्‍तु इन्‍द्रि‍य सुख की प्रबल कामना मन को असुर बना देती है. असुर का अर्थ है बुराई को गति‍ देने वाला. अच्‍छे संस्‍कार मन को अच्‍छाई या देवत्‍व के गुण अपनाने को प्रेरि‍त करते हैं. इन्‍द्रि‍य सुख का लोभ मन को बुराई की ओर ढकेल देता है और वह बलात्‍कार, छल, कपट आदि‍ में संलग्‍न हो जाता है. दो वि‍परीत धाराओं में मन का जाना ही देवासुर संग्राम है. मन ही देवता है, मन ही राक्षस है. मानसि‍क द्वन्‍द्व के अति‍रि‍क्‍त देवासुर संग्राम कभी अस्‍ति‍त्‍व में नहीं रहा.

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भौति‍कवादी और अध्‍यात्‍मवादी में क्‍या अन्‍तर है ?

भौति‍कवादी की पहुँच ब्रह्म के शरीर या वि‍श्‍व के भौति‍क पदार्थों में नि‍हि‍त आनन्‍द तक सीमि‍त होती है. अध्‍यात्‍मवादी की पहुँच ब्रह्म के मन तक होती है और वह इन्‍द्रि‍य-वि‍षयों से भि‍न्‍न आनन्‍द प्राप्‍त कर लेता है.

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वैराग्‍य क्‍या है ? वैराग्‍य से ऊपर क्‍या है ?

इन्‍द्रि‍य-वि‍षयों में आसक्‍ति‍ का त्‍याग वैराग्‍य है.

परोपकार में मन लगाना वैराग्‍य से ऊपर है.

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इन्‍द्रि‍यों के वि‍षयों से क्‍या तात्‍पर्य है ?

पांच ज्ञानेन्‍द्रि‍यों के पांच वि‍षय हैं —
ज्ञानेन्‍द्रि‍यां वि‍षय
आंख रूप
जीभ रस
नाक गन्‍ध
त्‍वचा स्‍पर्श
कान शब्‍द

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कौन श्रेष्‍ठ है ?

शरीर में इन्‍द्रि‍यां श्रेष्‍ठ हैं, इन्‍द्रि‍यों से उनके वि‍षय श्रेष्‍ठ हैं, वि‍षय से मन श्रेष्‍ठ है, मन से बुद्धि‍ श्रेष्‍ठ है, बुद्धि‍ से आत्‍मा या महत्तत्त्व श्रेष्‍ठ है, महत्तत्त्व से अव्‍यक्‍त श्रेष्‍ठ है और अव्‍यक्‍त से पुरुष श्रेष्‍ठ है. पुरुष से परे कुछ नहीं है.
(कठोपनि‍षद्)

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शरीर और आत्‍मा के सम्‍बन्‍ध को एक रूपक से समझाइए.

शरीर रथ आत्‍मा रथी बुद्धि‍ सारथी मन लगाम तथा इन्‍द्रि‍यां घोड़े हैं.
(कठोपनि‍षद्)

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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