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जैसे विन्दु की परिभाषा दी जाती है कि जिसमें लम्बाई-चौड़ाई न हो फिर भी आप कितना भी छोटा विन्दु बनायें कुछ न कुछ लम्बाई और चौड़ाई अवश्य होगी; जैसे रेखा की परिभाषा दी जाती है कि जिसमें केवल लम्बाई हो चौड़ाई न हो फिर भी कितनी ही पतली रेखा खींची जाय चौड़ाई अवश्य होगी वैसे ही मन को निराकार में केन्द्रित नहीं किया जा सकता; अत: हम परमात्मा के किसी नाम को लिपि के अनुसार अक्षरों में केन्द्रित कर सकते हैं या किसी प्रतिमा में उसका आरोपण कर सकते हैं. वैदिक काल में जब न तो मन्दिर थे और न ही मूर्ति, अग्नि प्रज्वलित कर उसमें हवन सामग्री डालते हुए किसी देव-नाम का आह्वान किया जाता था. उपनिषदों के ज्ञाता यज्ञ की प्रक्रिया छोड़ कर ओम् अक्षर पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करने लगे. बुद्ध और महावीर की मूर्तियों को अपार जन-समर्थन मिलने के कारण यहॉं भी विभिन्न सम्प्रदायों ने मूर्ति पूजा को आधार बनाया. मन्दिर, मस्जिद या चर्च का र्निमाण भी प्रतिमा में विश्वास ही है. वैदिक आर्य तो मन्दिर का भी र्निमाण नहीं करते थे. वास्तविक अर्थ में वे ही मूर्तिपूजक नहीं थे. अत: अन्य धर्मों के प्रचारक यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि वे मूर्तिपूजक नहीं है. सूफी सन्तों की मजार बनाना या ईसा को क्रूस पर लटके दिखाना, या मृतक की समाधि बनाना सब कुछ किसी प्रतिमा का पूजन ही है. इस प्रकार जो काम सब कर रहे हैं उसको देखते हुए मन्दिर में किसी मूर्ति को स्थापित कर देने का विरोध नहीं किया जा सकता.Labels: आर्य, उपनिषद्, परमात्मा, पूजा, प्रतिमा, मन्दिर, मूर्ति पूजा, वैदिक

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उपनिषदों में वैदिक विचारधारा विकास के शिखर पर पहुँच गयी है. अत: उपनिषदों को वेदान्त कहा जाता है. उपनिषदों और बादरायण के ब्रह्मसूत्र के आधार पर जिस दर्शन का विकास हुआ है उसे वेदान्त दर्शन कहते हैं.Labels: उपनिषद्, दर्शन, ब्रह्मसूत्र, वेदान्त, वैदिक

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वेद के पुरुष और ब्रह्म के विराट रूप में कोई अन्तर नहीं है. इस प्रकार वेद के अनुसार पुरुष एक है. सांख्य दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव के शरीर से संपर्कित एक-एक पुरुष है. इस प्रकार सांख्य के अनुसार पुरुष अनेक हैं. किन्तु वेद तथा सांख्य दोनों पुरुष को निरपेक्ष तथा नित्य मानते हैं. सम्भवत: भ्रम को दूर करने के लिए उपनिषदों में ब्रह्म शब्द का अधिक प्रयोग किया गया है.Labels: उपनिषद्, दर्शन, पुरुष, ब्रह्म, विराट, वेद, सांख्य

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उपनिषदों का कहना है कि जीवन इसलिए इतना प्रिय है कि यह आनन्दमय है. यदि जीवन में आनन्द नहीं रहता तो इसे कौन चाहता.Labels: आनन्द, उपनिषद्, जीवन, विज्ञान

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सभी का अर्थ एक सत्ता ही है जैसे —
- आत्मा एव इदं सर्वम् (छान्दोग्य उपनिषद् 7-25-2) यह आत्मा ही सब कुछ है.
- सर्वं खलु इदं ब्रह्म (छान्दोग्य उपनिषद्) सब कुछ निश्चय ही यह ब्रह्म ही है.
- सदेव सौम्य इदम् अग्रे आसीत्, एकम् एवं अद्वितीयम् (छान्दोग्य 6-2-1) पहले सत् ही था, अकेला और अद्वितीय.
- अयम् आत्मा ब्रह्म (बृहदारण्यक उपनिषद् 2-5-19) यह आत्मा ही ब्रह्म है.
- एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति (ऋग्वेद)
Labels: आत्मा, उपनिषद्, छान्दोग्योपनिषद्, बृहदारण्यक, ब्रह्म

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स्पष्टतया वेद में इसका उल्लेख नहीं है. सतपथ ब्राह्मण में सबसे पहले कर्म के सिद्धान्त का उल्लेख मिलता है. उपनिषदों में पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धान्त को दृढ़ता प्रदान की गयी है.Labels: उपनिषद्, कर्म, पुनर्जन्म, वेद, सतपथ ब्राह्मण, सिद्धान्त

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उपनिषदों में कर्म तथा पुनर्जन्म की अवधारणाओं को एक सिद्धान्त का रूप दिया गया है. कठोपनिषद् में इस विचार को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है कि मृतक की आत्मा नवीन शरीर धारण करती है. आत्मा अपने कर्म तथा ज्ञान के अनुसार जड़ वस्तुओं जैसे पेड़ या पौधों का स्वरूप भी ग्रहण कर सकती है.Labels: आत्मा, उपनिषद्, कठोपनिषद्, कर्म, ज्ञान, पुनर्जन्म

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हिन्दी साहित्य के इतिहास के लेखन में भक्ति काल को निर्गुण भक्ति शाखा तथा सगुण भक्ति शाखा में विभाजित किया जाता है. कबीर जैसे कवि जो निराकार ईश्वर में विश्वास करते हैं निर्गुण भक्ति शाखा से सम्बन्धित माने जाते हैं. निर्गुण ब्रह्म के उपास्य न होने के कारण वास्तव में कबीर की उपासना सगुण ब्रह्म की उपासना है. सगुण भक्ति शाखा के कवि सूरदास और तुलसीदास आदि हैं जो कृष्ण और राम को ईश्वर का अवतार मानते हैं. राम और कृष्ण शब्द ईश्वर के पर्यायवाची हैं. इसी अर्थ में ये शब्द सगुण ब्रह्म के लिए प्रयुक्त हो सकते हैं. वेद और उपनिषद अवतारवाद में विश्वास नहीं करते. जो कवि अवतारवाद में विश्वास करते हैं वे वास्तव में अवतारवादी भक्ति शाखा के कवि हैं सगुण भक्ति शाखा के कवि नहीं. Labels: अवतार, ईश्वर, उपनिषद्, उपासना, निर्गुण ब्रह्म, निराकार, ब्रह्म, भक्ति, वेद, सगुण ब्रह्म

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