कर्म का सि‍द्धान्‍त वि‍ज्ञान सम्‍मत कैसे हो सकता है ?

कर्म और क्रि‍या में कोई भेद नहीं है. प्रत्‍येक क्रि‍या की प्रति‍क्रि‍या होती है, यह वि‍ज्ञान भी मानता है. प्रति‍क्रि‍या समान बल की वि‍परीत दि‍शा में होती है. कर्म का सि‍द्धान्‍त कहता है कि‍ मन और वाणी की क्रि‍या की भी प्रति‍क्रि‍या होती है. यदि‍ आप वाणी का प्रयोग कर कि‍सी को गाली देंगे तो हो सकता है वह आपको मारने दौड़े. मन में पाप आने पर मन आपको पाप कर्म की ओर ढकेल देगा. शारीरि‍क क्रि‍या होते ही वि‍ज्ञान का नि‍यम लागू हो जायेगा. मन और वाणी की क्रि‍या को वि‍ज्ञान मापने में समर्थ नहीं है.

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ऋत कि‍से कहते हैं ?

वैदि‍क ऋषि‍यों का वि‍श्‍वास था कि‍ प्रकृति‍ के सभी कार्य सर्वव्‍यापी नि‍यम के अनुसार होते हैं जि‍ससे सभी जीव और वि‍षय परि‍चालि‍त होते हैं. इसे ऋत कहते हैं जि‍सके द्वारा चन्‍द्र, सूर्य आदि‍ ग्रह अपने स्‍थानों पर अवस्‍थि‍त रहते हैं. इसी ऋत के द्वारा सभी जीवों को कर्म के फल मि‍लते हैं.

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नि‍राशा से बचने के लि‍ए क्‍या करना चाहि‍ए ?

आशा के अनुरूप फल न मि‍लने पर नि‍राशा उत्‍पन्‍न होती है. अत: यथोचि‍त कर्म करते रहने पर भी कम से कम फल की आशा रखनी चाहि‍ए.

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अच्‍छा और बुरा क्‍या है ?

अच्‍छा और बुरा वि‍शेषण हैं जो संज्ञा के स्‍वभाव का वर्णन करते हैं. कर्म से सम्‍बद्ध होकर अच्‍छा या बुरा सापेक्ष अर्थ रखते हैं. वर्षा पकती फसल के लि‍ए बुरी तथा उगती फसल के लि‍ए अच्‍छी होती है. जो कर्म अपने मन अथवा सम्‍बद्ध समाज के अनुकूल होता है उसे अच्‍छा तथा जो कर्म अपने मन अथवा सम्‍बद्ध समाज के प्रति‍कूल होता है उसे बुरा कहा जाता है.

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क्‍या वेद में कर्म के सि‍द्धान्‍त का उल्‍लेख है ? यदि‍ नहीं तो यह कहां से प्रस्‍फुटि‍त हुआ ?

स्‍पष्‍टतया वेद में इसका उल्‍लेख नहीं है. सतपथ ब्राह्मण में सबसे पहले कर्म के सि‍द्धान्‍त का उल्‍लेख मि‍लता है. उपनि‍षदों में पुनर्जन्‍म और कर्म के सि‍द्धान्‍त को दृढ़ता प्रदान की गयी है.

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अकर्म क्‍या है ?

कर्म वि‍कर्म का संयोग पाकर अकर्म में बदल जाता है अर्थात् नि‍ष्‍पाप मन से कि‍या गया कार्य मनुष्‍य को कर्मफल भोग से नहीं बांधता.

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गीता के अनुसार वि‍कर्म का क्‍या तात्‍पर्य है ?

मन की शुद्धता के लि‍ए आवश्‍यक कर्म वि‍कर्म कहलाते हैं जैसे इच्‍छा, आसक्‍ति‍ और क्रोध पर नि‍यन्‍त्रण रखना आदि‍.

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कर्म कि‍तने प्रकार के होते हैं ?

संचि‍त कर्म, प्रारब्‍ध कर्म तथा क्रि‍यमाण कर्म ये कर्म के तीन प्रकार हैं. पूर्व जन्‍म में कि‍ये गये कर्म संचि‍त कर्म कहे जाते हैं. पूर्व जन्‍म के कर्मों में जि‍न कर्मों का फल इस जन्‍म में भोगना पड़ता है वे प्रारब्‍ध कर्म कहे जाते हैं. व्‍यक्‍ति‍ द्वारा वर्तमान जीवन में कि‍या जा रहा कर्म क्रि‍यमाण कर्म कहलाता है.

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गीता के अनुसार कर्म और उसके तत्त्व क्‍या हैं ?

गीता के अनुसार मन, वाणी तथा शरीर से की गयी सभी प्रकार की क्रि‍याऍं कर्म हैं.

कर्म के पांच तत्त्व होते हैं—
  1. कर्ता
  2. कार्य का स्‍थान
  3. साधन
  4. प्रयत्‍न
  5. भाग्‍य.

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क्‍या उपि‍नषदों में पुनर्जन्‍म को मान्‍यता दी गयी है ?

उपनि‍षदों में कर्म तथा पुनर्जन्‍म की अवधारणाओं को एक सि‍द्धान्‍त का रूप दि‍या गया है. कठोपनि‍षद् में इस वि‍चार को स्‍पष्‍ट रूप से व्‍यक्‍त कि‍या गया है कि‍ मृतक की आत्‍मा नवीन शरीर धारण करती है. आत्‍मा अपने कर्म तथा ज्ञान के अनुसार जड़ वस्‍तुओं जैसे पेड़ या पौधों का स्‍वरूप भी ग्रहण कर सकती है.

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मनुष्‍य का आगामी जीवन कि‍स प्रकार नि‍र्धारि‍त होता है ?

मनुष्‍य का आगामी जीवन स्‍वयं के कर्मों द्वारा नि‍र्धारि‍त होता है.

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मृत्‍यु के बाद कौन साथ नहीं छोड़ता ?

मृत्‍यु के बाद नाम और कर्म साथ नहीं छोड़ता.
(बृहदारण्‍यक उपनि‍षद्)

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ब्रह्मानुभूति‍ प्राप्‍त व्‍यक्‍ति‍ जीवि‍त रहते हुए कि‍स प्रकार कर्मरत रह सकता है ?

अनासक्‍त कर्म करके ऐसा व्‍यक्‍ति‍ बन्‍धन में नहीं फँसता. ऐसे व्‍यक्‍ति‍ को अन्‍य जीवों के उपकारार्थ नि‍:स्‍वार्थ कर्म करना चाहि‍ए.

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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