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कर्म और क्रिया में कोई भेद नहीं है. प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, यह विज्ञान भी मानता है. प्रतिक्रिया समान बल की विपरीत दिशा में होती है. कर्म का सिद्धान्त कहता है कि मन और वाणी की क्रिया की भी प्रतिक्रिया होती है. यदि आप वाणी का प्रयोग कर किसी को गाली देंगे तो हो सकता है वह आपको मारने दौड़े. मन में पाप आने पर मन आपको पाप कर्म की ओर ढकेल देगा. शारीरिक क्रिया होते ही विज्ञान का नियम लागू हो जायेगा. मन और वाणी की क्रिया को विज्ञान मापने में समर्थ नहीं है.Labels: कर्म, क्रिया

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वैदिक ऋषियों का विश्वास था कि प्रकृति के सभी कार्य सर्वव्यापी नियम के अनुसार होते हैं जिससे सभी जीव और विषय परिचालित होते हैं. इसे ऋत कहते हैं जिसके द्वारा चन्द्र, सूर्य आदि ग्रह अपने स्थानों पर अवस्थित रहते हैं. इसी ऋत के द्वारा सभी जीवों को कर्म के फल मिलते हैं.Labels: ऋत, ऋषि, कर्म, चन्द्र, जीव, विश्वास, विषय, वैदिक, सूर्य

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आशा के अनुरूप फल न मिलने पर निराशा उत्पन्न होती है. अत: यथोचित कर्म करते रहने पर भी कम से कम फल की आशा रखनी चाहिए.Labels: आशा, कर्म, निराशा, फल

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अच्छा और बुरा विशेषण हैं जो संज्ञा के स्वभाव का वर्णन करते हैं. कर्म से सम्बद्ध होकर अच्छा या बुरा सापेक्ष अर्थ रखते हैं. वर्षा पकती फसल के लिए बुरी तथा उगती फसल के लिए अच्छी होती है. जो कर्म अपने मन अथवा सम्बद्ध समाज के अनुकूल होता है उसे अच्छा तथा जो कर्म अपने मन अथवा सम्बद्ध समाज के प्रतिकूल होता है उसे बुरा कहा जाता है.Labels: अच्छाई, कर्म, बुराई, समाज

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स्पष्टतया वेद में इसका उल्लेख नहीं है. सतपथ ब्राह्मण में सबसे पहले कर्म के सिद्धान्त का उल्लेख मिलता है. उपनिषदों में पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धान्त को दृढ़ता प्रदान की गयी है.Labels: उपनिषद्, कर्म, पुनर्जन्म, वेद, सतपथ ब्राह्मण, सिद्धान्त

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संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म तथा क्रियमाण कर्म ये कर्म के तीन प्रकार हैं. पूर्व जन्म में किये गये कर्म संचित कर्म कहे जाते हैं. पूर्व जन्म के कर्मों में जिन कर्मों का फल इस जन्म में भोगना पड़ता है वे प्रारब्ध कर्म कहे जाते हैं. व्यक्ति द्वारा वर्तमान जीवन में किया जा रहा कर्म क्रियमाण कर्म कहलाता है.Labels: कर्म, क्रियमाण, जन्म, जीवन, प्रारब्ध, व्यक्ति

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गीता के अनुसार मन, वाणी तथा शरीर से की गयी सभी प्रकार की क्रियाऍं कर्म हैं.
कर्म के पांच तत्त्व होते हैं—
- कर्ता
- कार्य का स्थान
- साधन
- प्रयत्न
- भाग्य.
Labels: कर्ता, कर्म, कार्य, क्रिया, गीता, तत्त्व, प्रयत्न, भाग्य, मन, वाणी, शरीर, साधन

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उपनिषदों में कर्म तथा पुनर्जन्म की अवधारणाओं को एक सिद्धान्त का रूप दिया गया है. कठोपनिषद् में इस विचार को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है कि मृतक की आत्मा नवीन शरीर धारण करती है. आत्मा अपने कर्म तथा ज्ञान के अनुसार जड़ वस्तुओं जैसे पेड़ या पौधों का स्वरूप भी ग्रहण कर सकती है.Labels: आत्मा, उपनिषद्, कठोपनिषद्, कर्म, ज्ञान, पुनर्जन्म

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मनुष्य का आगामी जीवन स्वयं के कर्मों द्वारा निर्धारित होता है.Labels: कर्म, जीवन, मनुष्य

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मृत्यु के बाद नाम और कर्म साथ नहीं छोड़ता.
(बृहदारण्यक उपनिषद्) Labels: कर्म, मृत्यु

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