सभी धर्म क्‍या करते हैं ?

सभी धर्म भौति‍क जगत या प्रकृति‍ की सीमाओं के पार जाने का यत्‍न करते हैं.

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माया के समष्‍टि‍ रूप तथा व्‍यष्‍टि‍ रूप से क्‍या तात्‍पर्य है ?

जब ब्रह्म नाना जीव-वि‍षयों से युक्‍त जगत् के रूप में अपने को प्रकट करता है तो यह ईश्‍वर की माया सामूहि‍क अर्थ में होने के कारण समष्‍टि‍ माया कहलाती है. जब कोई प्राणी अज्ञानता के कारण जगत् को एक ब्रह्ममय देखने के बजाय अनेक जीवों और वि‍षयों के रूप में देखता है तो वह व्‍यष्‍टि‍ माया से ग्रस्‍त या अवि‍द्या से ग्रस्‍त होता है. व्‍यवहार में पहले अर्थ में माया तथा दूसरे अर्थ में अवि‍द्या शब्‍द प्रयुक्‍त होता है.

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निर्गुण ब्रह्म के लिए ‘स:’ शब्‍द का प्रयोग नहीं कि‍या जाता. ऐसा क्‍यों है ?

‘स:’ शब्‍द के कहे जाने से ब्रह्म व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेष हो जाता, इससे जीव-जगत के साथ उसका सम्‍पूर्ण अलगाव सूचि‍त होता. इस‍लि‍ए स: के स्‍थान पर निर्गुण वाचक ‘तत्’ शब्‍द का प्रयोग वेदों में कि‍या गया है और तत् शब्‍द से निर्गुण ब्रह्म का प्रचार हुआ है.

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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