आत्‍मरक्षण की प्रवृत्‍ति‍ सभी जीवों में होती है इसे वि‍ज्ञान मानता है. ऐसा होने का कारण क्‍या है ?

उपनि‍षदों का कहना है कि‍ जीवन इसलि‍ए इतना प्रि‍य है कि‍ यह आनन्‍दमय है. यदि‍ जीवन में आनन्‍द नहीं रहता तो इसे कौन चाहता.

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क्‍या कर्मकाण्‍ड के द्वारा मोक्ष की प्राप्‍ति‍ हो सकती है ?

कर्मकाण्‍ड अर्थात् यज्ञादि‍ कर्मों के सम्‍पादन से जीवन के परम पुरुषार्थ अर्थात् अमरत्‍व की प्राप्‍ति‍ नहीं हो सकती. मुण्‍डकोपनि‍षद् का कहना है कि‍ ये कर्म क्षुद्र नौकाओं के समान हैं जि‍नके द्वारा भवसागर को पार नहीं कि‍या जा सकता.

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वि‍श्‍व धर्म क्‍या है ?

स्‍वस्‍थ आचरण, करुणा, दान, पवि‍त्रता, सादा जीवन, अहंकार का त्‍याग, सत्‍य-पालन, ईमान, सह-अस्‍ति‍त्‍व सभी धर्म सि‍खाते हैं. यही वि‍श्‍व धर्म है.

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सामाजि‍क जीवन में आ रही वि‍कृति‍ जैसे बलात्‍कार की घटनाओं में वृद्धि‍ आदि‍ का सबसे बड़ा कारण क्‍या है ?

शराब और अन्‍य नशीले पदार्थों का सेवन.

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दाम्‍पत्‍य जीवन में मि‍ठास कैसे भरी जा सकती है ?

आपसी समझ और वि‍श्‍वास में वृद्धि‍ करके.

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क्‍या भक्‍ति‍ और मुक्‍ति‍ ही जीवन का उद्देश्‍य है ?

प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति‍ को अपने जीवन का उद्देश्‍य नि‍र्धारि‍त करने का अधि‍कार है. ईश्‍वर भक्‍ति‍ या मुक्‍ति‍ के लि‍ए प्रेरि‍त नहीं करता.

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कर्म कि‍तने प्रकार के होते हैं ?

संचि‍त कर्म, प्रारब्‍ध कर्म तथा क्रि‍यमाण कर्म ये कर्म के तीन प्रकार हैं. पूर्व जन्‍म में कि‍ये गये कर्म संचि‍त कर्म कहे जाते हैं. पूर्व जन्‍म के कर्मों में जि‍न कर्मों का फल इस जन्‍म में भोगना पड़ता है वे प्रारब्‍ध कर्म कहे जाते हैं. व्‍यक्‍ति‍ द्वारा वर्तमान जीवन में कि‍या जा रहा कर्म क्रि‍यमाण कर्म कहलाता है.

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संस्‍कृति‍ क्‍या है ?

संस्‍कृति‍ सामाजि‍क जीवन का वह उत्‍तम स्‍वरूप है जि‍से समाज बचाये रखना चाहता है और जो समाज को एकजुट रखने में सहायक होता है.

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जीवन-यापन के साधन रहने पर भी नि‍रोगी मनुष्‍य क्‍यों दु:खी हो जाता है ?

दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करके प्राय: मतुष्‍य का मन दु:खी हो जाता है.

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मनुष्‍य का आगामी जीवन कि‍स प्रकार नि‍र्धारि‍त होता है ?

मनुष्‍य का आगामी जीवन स्‍वयं के कर्मों द्वारा नि‍र्धारि‍त होता है.

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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