कर्मकाण्ड अर्थात् यज्ञादि कर्मों के सम्पादन से जीवन के परम पुरुषार्थ अर्थात् अमरत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती. मुण्डकोपनिषद् का कहना है कि ये कर्म क्षुद्र नौकाओं के समान हैं जिनके द्वारा भवसागर को पार नहीं किया जा सकता.
संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म तथा क्रियमाण कर्म ये कर्म के तीन प्रकार हैं. पूर्व जन्म में किये गये कर्म संचित कर्म कहे जाते हैं. पूर्व जन्म के कर्मों में जिन कर्मों का फल इस जन्म में भोगना पड़ता है वे प्रारब्ध कर्म कहे जाते हैं. व्यक्ति द्वारा वर्तमान जीवन में किया जा रहा कर्म क्रियमाण कर्म कहलाता है.