वेदान्‍त क्‍या है ?

उपनि‍षदों में वैदि‍क वि‍चारधारा वि‍कास के शि‍खर पर पहुँच गयी है. अत: उपनि‍षदों को वेदान्‍त कहा जाता है. उपनि‍षदों और बादरायण के ब्रह्मसूत्र के आधार पर जि‍स दर्शन का वि‍कास हुआ है उसे वेदान्‍त दर्शन कहते हैं.

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वेद के पुरुष तथा सांख्‍य दर्शन के पुरुष में क्‍या अन्‍तर है ?

वेद के पुरुष और ब्रह्म के वि‍राट रूप में कोई अन्‍तर नहीं है. इस प्रकार वेद के अनुसार पुरुष एक है. सांख्‍य दर्शन के अनुसार प्रत्‍येक जीव के शरीर से संपर्कित एक-एक पुरुष है. इस प्रकार सांख्‍य के अनुसार पुरुष अनेक हैं. कि‍न्‍तु वेद तथा सांख्‍य दोनों पुरुष को नि‍रपेक्ष तथा नि‍त्‍य मानते हैं. सम्‍भवत: भ्रम को दूर करने के लि‍ए उपनि‍षदों में ब्रह्म शब्‍द का अधि‍क प्रयोग कि‍या गया है.

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सांख्‍य दर्शन के दो प्रमुख तत्त्व क्‍या हैं ?

पुरुष और प्रकृति‍. यह दर्शन द्वैतवादी है. पुरुष चेतन है, यह नि‍त्‍य है, अपरि‍वर्तनीय है. प्रकृति‍ इस संसार का आदि‍ कारण है. यह एक नि‍त्‍य और जड़ वस्‍तु है कि‍न्‍तु सदा परि‍वर्तनशील है.

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न्‍याय दर्शन कि‍तने प्रमाण मानता है ?

प्रत्‍यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्‍द ये चार प्रमाण हैं.

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वेद के ज्ञान-काण्‍ड पर आधारि‍त दर्शन कौन सा है ?

वेदान्‍त.

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कर्मकाण्‍ड पर आधारि‍त दर्शन कौन सा है ?

मीमांसा.

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नास्‍ति‍क कि‍से कहते हैं ?

ईश्‍वर के अस्‍ति‍त्‍व को न मानने वाला नास्‍ति‍‍क कहलाता है. भारतीय दर्शन में वेदों को न मानने वाले अर्थात् चार्वाक, बौद्ध तथा जैन नास्‍ति‍क दर्शन हैं.

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आस्‍ति‍क दर्शन कि‍न्‍हें कहा जाता है ?

षड्दर्शन अर्थात् न्‍याय, वैशेषि‍क, सांख्‍य, योग, मीमांसा तथा वेदान्‍त आस्‍ति‍क दर्शन कहे जाते हैं.

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आस्‍ति‍क कि‍से कहते हैं ?

ईश्‍वर में वि‍श्‍वास रखने वाले को आस्‍ति‍क कहते हैं. भारतीय दर्शन के अध्‍ययन में वेदों को मानने वाले दर्शन आस्‍ति‍क कहे जाते हैं.

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वेद में मूर्ति‍ पूजा के वि‍षय में क्‍या कहा गया है ?

यजुर्वेद के बत्‍तीसवें अध्‍याय में परमात्‍मा के वि‍षय में कहा गया है कि‍ अग्‍नि‍ वही है, आदि‍त्‍य वही है, वायु, चन्‍द्र और शुक्र वही है, जल, प्रजापति‍ और सर्वत्र भी वही है. वह प्रत्‍यक्ष नहीं देखा जा सकता है. उसकी कोई प्रति‍मा नहीं है (न तस्‍य प्रति‍मा). उसका नाम ही अत्‍यन्‍त महान है. वह सब दि‍शाओं को व्‍याप्‍त कर स्‍थि‍त है. स्‍पष्‍ट है कि‍ वेद के अनुसार ईश्‍वर की न तो कोई प्रति‍मा या मूर्ति‍ है और न ही उसे प्रत्‍यक्ष रूप में देखा जा सकता है. कि‍सी मूर्ति‍ में ईश्‍वर के बसने या ईश्‍वर का प्रत्‍यक्ष दर्शन करने का कथन वेदसम्‍मत नहीं है.

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வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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