देवासुर संग्राम से क्‍या तात्‍पर्य है ?

परमात्‍मा ने सुख प्राप्‍ति‍ के लि‍ए इन्‍द्रि‍याँ बनायी हैं. इन्‍द्रि‍यों के माध्‍यम से मन ही सुख भोगता है. स्‍मरण-शक्‍ति‍ के कारण मन पूर्व में भोगे गये सुख को याद रखता है. इस सुख को पाने के लि‍ए मन अनुचि‍त साधन भी अपना लेता है. परमात्‍मा ने मन को देवत्‍व प्रदान कि‍या है. कि‍न्‍तु इन्‍द्रि‍य सुख की प्रबल कामना मन को असुर बना देती है. असुर का अर्थ है बुराई को गति‍ देने वाला. अच्‍छे संस्‍कार मन को अच्‍छाई या देवत्‍व के गुण अपनाने को प्रेरि‍त करते हैं. इन्‍द्रि‍य सुख का लोभ मन को बुराई की ओर ढकेल देता है और वह बलात्‍कार, छल, कपट आदि‍ में संलग्‍न हो जाता है. दो वि‍परीत धाराओं में मन का जाना ही देवासुर संग्राम है. मन ही देवता है, मन ही राक्षस है. मानसि‍क द्वन्‍द्व के अति‍रि‍क्‍त देवासुर संग्राम कभी अस्‍ति‍त्‍व में नहीं रहा.

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ईश्‍वर या देवता कुमारी कन्‍याओं को क्‍यों गर्भवती बनाता है ? उनसे पुत्र ही क्‍यों उत्‍पन्‍न होता है, पुत्री क्‍यों नहीं ?

पुरुष प्रधान समाज में पुरुष ही महान या शक्‍ति‍शाली बनता रहा है. अब यदि‍ उसका जन्‍म कि‍सी कुमारी से हुआ है तो उसे देवत्‍व प्रदान करने के लि‍ए यह कह दि‍या गया कि‍ गर्भ कि‍सी देवता के कारण ठहरा है. सृष्‍टि‍ में हर माता की कोख पूज्‍य है.

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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