वेद के पुरुष तथा सांख्‍य दर्शन के पुरुष में क्‍या अन्‍तर है ?

वेद के पुरुष और ब्रह्म के वि‍राट रूप में कोई अन्‍तर नहीं है. इस प्रकार वेद के अनुसार पुरुष एक है. सांख्‍य दर्शन के अनुसार प्रत्‍येक जीव के शरीर से संपर्कित एक-एक पुरुष है. इस प्रकार सांख्‍य के अनुसार पुरुष अनेक हैं. कि‍न्‍तु वेद तथा सांख्‍य दोनों पुरुष को नि‍रपेक्ष तथा नि‍त्‍य मानते हैं. सम्‍भवत: भ्रम को दूर करने के लि‍ए उपनि‍षदों में ब्रह्म शब्‍द का अधि‍क प्रयोग कि‍या गया है.

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सांख्‍य दर्शन के दो प्रमुख तत्त्व क्‍या हैं ?

पुरुष और प्रकृति‍. यह दर्शन द्वैतवादी है. पुरुष चेतन है, यह नि‍त्‍य है, अपरि‍वर्तनीय है. प्रकृति‍ इस संसार का आदि‍ कारण है. यह एक नि‍त्‍य और जड़ वस्‍तु है कि‍न्‍तु सदा परि‍वर्तनशील है.

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ईश्‍वर या देवता कुमारी कन्‍याओं को क्‍यों गर्भवती बनाता है ? उनसे पुत्र ही क्‍यों उत्‍पन्‍न होता है, पुत्री क्‍यों नहीं ?

पुरुष प्रधान समाज में पुरुष ही महान या शक्‍ति‍शाली बनता रहा है. अब यदि‍ उसका जन्‍म कि‍सी कुमारी से हुआ है तो उसे देवत्‍व प्रदान करने के लि‍ए यह कह दि‍या गया कि‍ गर्भ कि‍सी देवता के कारण ठहरा है. सृष्‍टि‍ में हर माता की कोख पूज्‍य है.

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कौन श्रेष्‍ठ है ?

शरीर में इन्‍द्रि‍यां श्रेष्‍ठ हैं, इन्‍द्रि‍यों से उनके वि‍षय श्रेष्‍ठ हैं, वि‍षय से मन श्रेष्‍ठ है, मन से बुद्धि‍ श्रेष्‍ठ है, बुद्धि‍ से आत्‍मा या महत्तत्त्व श्रेष्‍ठ है, महत्तत्त्व से अव्‍यक्‍त श्रेष्‍ठ है और अव्‍यक्‍त से पुरुष श्रेष्‍ठ है. पुरुष से परे कुछ नहीं है.
(कठोपनि‍षद्)

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आत्‍मा कौन है ?

वह जो प्राणों में बुद्धि‍वृत्‍ति‍यों के भीतर रहने वाला वि‍ज्ञानमय ज्‍योति‍ स्‍वरूप पुरुष है वही आत्‍मा है.
(बृहदारण्‍यक उपनि‍षद्)

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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