शंकराचार्य का अद्वैत क्‍या कहता है ?

शंकर का कहना है कि‍ यदि‍ पारमार्थि‍क सत्‍ता एक है तो संसार की सृष्‍टि‍ वस्‍तुत: सृष्‍टि‍ नहीं है. अवि‍द्या या माया के कारण ही एक ब्रह्म अनेक रूप में दि‍खता है. माया जादूगर की शक्‍ति‍ की तरह ईश्‍वर की ही शक्‍ति‍ है. जो सम्‍बन्‍ध आग तथा उसकी जलने की शक्‍ति‍ में है वही सम्‍बन्‍ध ईश्‍वर तथा माया में है.

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गोपी संग रास लीला का क्‍या अर्थ है ?

वेद में वि‍ष्‍णु को संसार का रक्षक होने के कारण गोप कहा गया है. संस्‍कृत में गो का अर्थ तारे, आकाश, पृथ्‍वी, प्रकाश की कि‍रण, स्‍वर्ग, मवेशी, वाणी, सूर्य, चन्‍द्रमा, गाय आदि‍ होता है. इन सबका पालनकर्ता होने से परमेश्‍वर गोप, गोपाल, गोपेन्‍द्र आदि‍ कहाता है. ईश्‍वर की माया या प्रकृति‍ गोपी या गोपि‍का कहलाती है. जैसे माया से ईश्‍वर मायापति‍ कहलाता है वैसे ही माया के पर्यायवाची शब्‍द गोपी से वह गोपीनाथ कहलाता है. रास शब्‍द का संस्‍कृत भाषा में अर्थ होता है ध्‍वनि‍ तथा लीला का अर्थ क्रीडा करना होता है. अपनी माया या गोपी के साथ परमेश्‍वर आज भी ध्‍वनि‍मय क्रीडा कर रहा है. गो का अर्थ गाय भी होने से गोप ग्‍वाले को भी तथा गोपी उसकी पत्‍नी अर्थात् ग्‍वालि‍न को भी कहते हैं. देवकीनन्‍दन कृष्‍ण को वि‍ष्‍णु का अवतार मान लेने के बाद मायापति‍ की लीला को गलत अर्थ में ले लि‍या गया. वि‍ष्‍णु की रास लीला कृष्‍ण की काम क्रीड़ा बन गयी. मूलत: कृष्‍ण नाम वि‍ष्‍णु का पर्यायवाची है. इस प्रकार कृष्‍ण नाम की महि‍मा को पुराण न्‍यून करते हैं.

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माया के समष्‍टि‍ रूप तथा व्‍यष्‍टि‍ रूप से क्‍या तात्‍पर्य है ?

जब ब्रह्म नाना जीव-वि‍षयों से युक्‍त जगत् के रूप में अपने को प्रकट करता है तो यह ईश्‍वर की माया सामूहि‍क अर्थ में होने के कारण समष्‍टि‍ माया कहलाती है. जब कोई प्राणी अज्ञानता के कारण जगत् को एक ब्रह्ममय देखने के बजाय अनेक जीवों और वि‍षयों के रूप में देखता है तो वह व्‍यष्‍टि‍ माया से ग्रस्‍त या अवि‍द्या से ग्रस्‍त होता है. व्‍यवहार में पहले अर्थ में माया तथा दूसरे अर्थ में अवि‍द्या शब्‍द प्रयुक्‍त होता है.

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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