अकर्म क्‍या है ?

कर्म वि‍कर्म का संयोग पाकर अकर्म में बदल जाता है अर्थात् नि‍ष्‍पाप मन से कि‍या गया कार्य मनुष्‍य को कर्मफल भोग से नहीं बांधता.

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गीता के अनुसार वि‍कर्म का क्‍या तात्‍पर्य है ?

मन की शुद्धता के लि‍ए आवश्‍यक कर्म वि‍कर्म कहलाते हैं जैसे इच्‍छा, आसक्‍ति‍ और क्रोध पर नि‍यन्‍त्रण रखना आदि‍.

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गीता के अनुसार कर्म और उसके तत्त्व क्‍या हैं ?

गीता के अनुसार मन, वाणी तथा शरीर से की गयी सभी प्रकार की क्रि‍याऍं कर्म हैं.

कर्म के पांच तत्त्व होते हैं—
  1. कर्ता
  2. कार्य का स्‍थान
  3. साधन
  4. प्रयत्‍न
  5. भाग्‍य.

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कौन श्रेष्‍ठ है ?

शरीर में इन्‍द्रि‍यां श्रेष्‍ठ हैं, इन्‍द्रि‍यों से उनके वि‍षय श्रेष्‍ठ हैं, वि‍षय से मन श्रेष्‍ठ है, मन से बुद्धि‍ श्रेष्‍ठ है, बुद्धि‍ से आत्‍मा या महत्तत्त्व श्रेष्‍ठ है, महत्तत्त्व से अव्‍यक्‍त श्रेष्‍ठ है और अव्‍यक्‍त से पुरुष श्रेष्‍ठ है. पुरुष से परे कुछ नहीं है.
(कठोपनि‍षद्)

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शरीर और आत्‍मा के सम्‍बन्‍ध को एक रूपक से समझाइए.

शरीर रथ आत्‍मा रथी बुद्धि‍ सारथी मन लगाम तथा इन्‍द्रि‍यां घोड़े हैं.
(कठोपनि‍षद्)

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आध्‍यात्‍मि‍क दु:ख कि‍से कहते हैं ?

संस्‍कृत में आत्‍मा शब्‍द देह के लि‍ए भी प्रयुक्‍त होता है. उसी अर्थ में जीव के शरीर या मन आदि‍ से उत्‍पन्‍न दु:ख आध्‍यात्‍मि‍क कहलाता है. जैसे क्षुधा, क्रोध, रोग, मानसि‍क संताप आदि‍.

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विश्‍व हिन्‍दू समाज વિશ્‍વ હિન્‍દૂ સમાજ বিশ্‍ব হিন্‍দূ সমাজ ਵਿਸ਼੍‍ਵ ਹਿਨ੍‍ਦੂ ਸਮਾਜ విశ్‍వ హిన్‍దూ సమాజ
வி்‍வ ஹிந்‍ ஸமாஜ വിശ്‍വ ഹിന്‍ദൂ സമാജ ଵିଶ୍‍ଵ ହିନ୍‍ଦୂ ସମାଜ ඵබඵ ඹඨඦෂ මථග ವಿಶ್‍ವ ಹಿನ್‍ದೂ ಸಮಾಜ
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