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गीता के अनुसार मन, वाणी तथा शरीर से की गयी सभी प्रकार की क्रियाऍं कर्म हैं.
कर्म के पांच तत्त्व होते हैं—
- कर्ता
- कार्य का स्थान
- साधन
- प्रयत्न
- भाग्य.
Labels: कर्ता, कर्म, कार्य, क्रिया, गीता, तत्त्व, प्रयत्न, भाग्य, मन, वाणी, शरीर, साधन

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शरीर में इन्द्रियां श्रेष्ठ हैं, इन्द्रियों से उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषय से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धि से आत्मा या महत्तत्त्व श्रेष्ठ है, महत्तत्त्व से अव्यक्त श्रेष्ठ है और अव्यक्त से पुरुष श्रेष्ठ है. पुरुष से परे कुछ नहीं है.
(कठोपनिषद्) Labels: आत्मा, इन्द्रियाँ, पुरुष, बुद्धि, मन, विषय, शरीर, श्रेष्ठ

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संस्कृत में आत्मा शब्द देह के लिए भी प्रयुक्त होता है. उसी अर्थ में जीव के शरीर या मन आदि से उत्पन्न दु:ख आध्यात्मिक कहलाता है. जैसे क्षुधा, क्रोध, रोग, मानसिक संताप आदि.Labels: आत्मा, आध्यात्मिक, क्रोध, क्षुधा, जीव, दु:ख, मन, मानसिक, शरीर, संताप

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